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श्वूंग होम>Society & News>पवित्र ग्रंथ>विपश्यना : जीवन जीने की कला

विपश्यना : जीवन जीने की कला

द्वारा: pratima avasthi     लेखक : - हेमंत उपाध्याय
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विपश्यना : जीवन जीने की कला


वर्तमान में जब चारों ओर अशांति और बेचैनी का माहौल नजर आता है। ऐसे में हर कोई शांति से जीवन जीने की कला सीखना चाहता है। इसी प्रभावी कला को विपश्यना के नाम से जाना जाता है। देश की इस अत्यंत पुरातन साधना विधि को लगभग ढाई हजार साल पहले भगवान गौतम बुद्ध ने सर्वकल्याण के लिए अपनी अनुभूतियों के बल पर सर्वसुलभ बनाया।

अंतर्मन की गहराइयों तक जाकर आत्मनिरीक्षण के जरिए आत्मशुद्धि की इस साधना को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से आचार्य सत्यनारायण गोयनका ने देश में इस साधना की शुरुआत की और उनके मार्गदर्शन में देशभर में वर्तमान में 70 विपश्यना साधना केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इंदौर में गोम्मटगिरि के पास साधना केंद्र में शनिवार से शुरू हुए दस दिवसीय शिविर में मार्गदर्शन देने आए सहायक आचार्य ब्रह्मानंद गोयल तिहाड़ जेल सहित देश की एकाधिक जेलों में कैदियों के लिए शिविर लगाकर मार्गदर्शन दे चुके हैं।

महासमुंद के गोयल ने बताया कि वे 1990 से विपश्यना से जुड़े और इसके बाद पूरा जीवन इसी को समर्पित कर दिया। अब तक 100 से ज्यादा शिविर ले चुके 76 बरस के गोयल ने पिछले दिनों स्वयं 45 दिन के शिविर में एक साधक के रूप में शिरकत की है। उनका कहना है कि विपश्यना चित्त और शरीर का मानसिक ऑपरेशन है। यह मनोविज्ञान से जुड़ा विषय है। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कभी कहा था कि भविष्य का धर्म बुद्ध धर्म होगा।

दरअसल भगवान बुद्ध ने धर्म सिखाया है बौद्ध धर्म नहीं। उन्होंने लोगों के कल्याण के लिए ही इस साधना पद्धति को विकसित किया। इतना स्पष्ट है कि यदि ठीक तरह से नियम पालन किया जाएगा तो ही फायदा होगा।

गोयल के अनुसार वर्तमान में मनुष्य की तृष्णा इतनी ज्यादा बढ़ गई कि वह धर्म को नहीं समझ रहा है। मनुष्य का स्वभाव और व्यवहार ही धर्म है। हिंसा और अपराध भी तृष्णा के कारण बढ़ रहे हैं। इन पर रोकथाम के लिए विपश्यना ही कारगर है।

गोयल का मानना है कि धर्म को कर्मकांड का रूप देकर जातिवाद से जोड़ दिया गया है। लेकिन विपश्यना साधना केंद्र पर न केवल मुस्लिम बल्कि हर समाज और धर्म के लोगों ने शिविर में शामिल होकर बताया है कि यह प्रयोग उनके लिए जीवन में उपयोगी साबित हुआ है। उन्होंने कहा कि धर्म वही है जो मन को निर्मल बना दे।

एक प्रश्न पर गोयल ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए विपश्यना शिविर में जाना अनिवार्य किया है। कई कंपनियाँ भी अपने कर्मचारियों की मानसिक दक्षता और कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए उन्हें नियमित रूप से इस तरह के शिविरों में अवकाश देकर भेज रही है। हम चाहते हैं कि प्रदेश में भी स्कूल-कॉलेजों में इस तरह के शिविर नियमित लगाए जाने चाहिए।

गोयल ने बताया कि अधिकांश रोग मनोरोग ही होते हैं। ऐसे में इनके उपचार में विपश्यना कारगर साबित हुई है। उन्होंने कहा कि विपश्यना सभी आयु वर्ग के लिए उपयोगी है खासकर उनके लिए अधिक जिनके मन में तृष्णा और लालच का भाव अधिक है।

तिहाड़ जेल में लगे शिविर में वे एक माह तक कैदियों के साथ ही पूरे समय रहे। उनके साथ ही भोजन किया और उनका आचरण काफी करीब से देखा। किरण बेदी की पहल से जेल में इस तरह का शिविर शुरू हुआ और अब हर माह दो शिविर लगाए जाते हैं। कई कैदियों ने बाद में उन्हें बताया कि विपश्यना से उनका जीवन पूरी तरह बदल गया।
प्रकाशन तिथि: 27 सितम्बर, 2011   
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