संकट में राष्ट्रीयता
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प्रकाशन तिथि: मार्च 31, 2008
देश की पहचान दुनिया भर में कायम करने वाली हर चीज खत्म हो रही है। राष्ट्रीयता की पहचान कराने वाले सभी निशान संकट में है। राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान जानने वाले लोग बमुश्किल नजर आते हैं। राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान घटता जा रहा है। आये दिन राष्ट्रध्वज के अपमान के मामले सामने आते हैं। राष्ट्रीय खेल हॉकी गर्त में है तो वहीं राष्ट्रभाषा बोलना शर्म की बात बन गयी है। संकट पूरी राष्ट्रीयता पर है, उसके हर प्रतीक चिह्न पर है। सत्यमेव जयते का जयघोष करने वाले राष्ट्र में झूठ का बोलबाला है। संसद से लेकर सड़क तक सत्यमेव जयते का रोज मजाक बनता है। श्रमेव जयते का नारा देने वाले देश में श्रम पर पूंजी का कब्जा हो रहा है। इतना ही नहीं श्रम का सम्मान पूरे समाज में घटा है। मेहनत किये बिना ही पैसा कमाना असली ध्येय होता जा रहा है। राष्ट्रीयता को अपने ही समाज की नजर लग गयी है। राष्ट्रीय कैलैंडर शक संवत को जानने वाले लोग ही देश में गिने-चुने हैं। सिर्फ सरकारी गजट में शक संवत चलता है बाकी जगह अंग्रेजी कैलेंडर का बोलबाला है। यही नहीं नयी पीढ़ी तो ये भी नहीं जानती कि देश के मन और मौसम के मुताबिक देश में नववर्ष भी होता है उसे पता है तो सिर्फ अंग्रेजी नववर्ष का। दुनिया भर से लोग जिस गंगा किनारे आध्यात्मिक सुख की तलाश में आते हैं उस गंगा के मैली होते जाने पर राष्ट्र में कोई हलचल नहीं होती। राष्ट्रीय पक्षी मोर अपने ही देशवासियों की बोयी फसलों का दाना चुगकर दम तोड़ देते हैं तो वहीं राष्ट्रीय पशु शेर शिकारियों के हाथों गीदड़ की मौत मर जाते हैं। राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए गुटबंदी होने लगी है। पुरस्कारो के दावे ठोंके जाने लगे हैं। राष्ट्रीय फूल कमल अब दिखता ही कम है तो वहीं राष्ट्रीय पेड़ की भी हालत खराब है। यानी हर वो चीज जो देश से जुड़ी है, देश की प्रतिष्ठा और उसके सम्मान से जुड़ी है, खत्म होती जा रही है। उसका पतन हो रहा है। नयी पीढ़ी तो उन्हें जानती भी नहीं वहीं पुरानी पीढ़ी को भी इसकी फिक्र नहीं। हर चीज को सरकार के भरोसे छोड़कर समाज शांत हो गया है। अब उसे न तो राष्ट्रीय ध्वज के अपमान पर शर्म है न ही राष्ट्र की पहचान दुनिया भर में कायम करने वाले पहचान चिह्नों के खत्म होने पर अफसोस।