किस असंभव की तलाश में है मन जैसे आम आसमान में लगे
हों और तारे पेड़ पर, लेकिन फिर भी हम ऐसी तलाश करते हैं। मन ही तो है, ऐसी ही उम्मीदें करता है, जो संभव नहीं होता। आप ऐसी उम्मीद दूसरों से कर रहे हों या अपने आपसे,
असंभव की उम्मीद तो असंभव की ही है। सनक की हद तक सही और सटीक होने की उम्मीद। सबकुछ सही-सही हो, कहीं कुछ गलत नहीं, कोई कमी नहीं। हिंदी का एक प्रसिद्ध नाटक है- तौलिए, जिसकी नायिका को साफ-सफाई के मामले में परफेक्शन की सनक है। उसके घर में अलग-अलग कामों के लिए दो दर्जन तौलिए हैं और एक काम के लिए रखे गए तौलिए किसी दूसरे काम के लिए इस्तेमाल नहीं किए जा सकते। इस सनक को वह जिंदगीभर ढोती है और अपने आसपास के लोगों का
जीवन मुश्किल कर देती है।
ऐसी असंभव तलाश क्यों होती है यह काफी समय से मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के शोध और अध्ययन का विषय रहा है कि मनुष्यों में इस तरह की प्रवृत्ति क्यों पैदा होती है। फ्रायड ने इस पर काफी काम किया है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि यह वास्तविक दुनिया का अपने मन में एक आभासी चित्र बना लेने से ऐसा होता है। अपने मन में ऐसी दुनिया रचना, जो कि वास्तविक नहीं होती। अपने आपसे और बाहरी संसार से की गई दमित अपेक्षाएं भी इसका कारण होती हैं। हमारी जो इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, वह कई बार इस तरह की सनक का रूप ले लेती हैं। यह सनक सिर्फ परफेक्शन की तलाश के रूप में ही नहीं, बल्कि बहुत से रूपों में नजर आती है।
जरूरी है काउंसलिंग यदि कोई व्यक्ति ऐसी स्थितियों से गुजर रहा है तो कई बार उसे आत्मावलोकन के साथ-साथ काउंसलिंग और चिकित्सकीय मदद की भी आवश्यकता होती है, क्योंकि एक समय के बाद यह सनक बीमारी का रूप ले लेती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने ऐसी बहुत-सी दवाएं भी ईजाद की हैं, जो इन स्थितियों में कारगर हैं। होमियोपैथी का आधा गणित तो मनोविज्ञान पर ही टिका हुआ है। होमियोपैथी में भी इस समस्या का इलाज है।
यदि हद से न गुजरी हो बात - अगर परफेक्शन की आपकी सनक हदों से पार नहीं हो गई है, तो आप खुद भी अपनी काउंसलिंग कर सकते हैं और समस्या के बढ़ने से पहले ही उससे निजात पा सकते हैं। जरा सोचें-
ध्यान दें कि आपसे दिनभर में कब-कब और कहां-कहां गलतियां हुई हैं? कितनी बार आपने अपने और दूसरों के साथ गलत किया, कामों में गलती की।
अपनी खामियों और कमजोरियों को स्वीकारें। यह आपको दूसरों की गलतियों के प्रति भी संवेदनशील बनाएगा।
इन समस्याओं पर दूसरों के साथ बातचीत करें।
जिस परफेक्शन की अपेक्षा आप दूसरों से कर रहे हैं, उस कसौटी पर सबसे पहले अपने आपको रखकर देखें कि क्या आप खरे उतरते हैं। यदि हां, तभी आप यह अपेक्षा दूसरों से कर सकते हैं लेकिन कई बार चुनौती और सनक में आप यह करने में सफल हो भी जाएं, तब भी यह समझना बहुत जरूरी है कि आपकी अपेक्षा कितनी वाजिब है। उसे पूरा करने के लिए आपको कितना सामान्य से अधिक श्रम करना पड़ा है। यह समझदारी हासिल करने की कोशिश आपके लिए मददगार साबित होगी। ऐसी अपेक्षा न करें, जो अपेक्षाओं की अंतिम सीमा से भी परे हो, बिलकुल असंभव हो।