Summarize Human Knowledge

.

श्वूंग होम>सामाजिक विज्ञान>मनोविज्ञान>उम्र के अहसास को बदलकर ही मिलता है चिर यौवन

.

उम्र के अहसास को बदलकर ही मिलता है चिर यौवन

द्वारा : pratima avasthi    

लेखक : सीताराम गुप्ता
उम्र के अहसास को बदलकर ही मिलता है चिर यौवन
एक अधेड़
उम्र की महिला दुकान पर कुछ सामान खरीदने के लिए गई, लेकिन दुकान पर भीड़ देखकर चुपचाप खड़ी हो गई। दुकानदार ने पहले उनको सामान देना चाहा तो उन्होंने मना कर दिया और कहा, 'मैं बाद में आराम से ले लूंगी।' भीड़ छंट जाने के बाद महिला ने धीरे से दुकानदार से कहा, 'मुझे हेयर डाई चाहिए।' क्या हेयर डाई खरीदने के लिए इतनी गोपनीयता की जरूरत थी? क्या हेयर डाई का प्रयोग करना गलत है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर इसे खरीदते वक्त इतनी मानसिक उलझन क्यों?
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है शारीरिक परिवर्तन होना भी स्वाभाविक है। बालों का सफेद होना, चेहरे पर झुर्रियां दिखलाई पड़ना, दृष्टि कमजोर होना और सुनाई कम पड़ना- कुछ ऐसे लक्षण हैं जो बढ़ती उम्र की ओर संकेत करते हैं। कुछ लोग इस स्थिति से भयभीत हो जाते हैं और इन लक्षणों को छुपाने का प्रयास करते हैं। बालों को रंगना या विभिन्न प्रकार की दवाओं के प्रयोग से जवान बने रहने की कोशिश करना ठीक है, लेकिन क्या इससे बढ़ती उम्र या बुढ़ापे से मुक्ति संभव है? ये बढ़ती उम्र या बुढ़ापे को दूर करने के नहीं, बल्कि उसे छुपाने के उपाय हैं।
जब आप बुढ़ापे के विरुद्ध कमर कसते हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि आपने बुढ़ापे को स्वीकार कर लिया है। बालों का सफेद होना अथवा शारीरिक क्षमता में कमी क्या बुढ़ापे के लक्षण हैं? कुछ हद तक तो ये बातें ठीक हैं, लेकिन बुढ़ापा या वृद्धावस्था वास्तव में मन की एक अवस्था है। बुढ़ापे से बचने का जो एकमात्र महत्त्वपूर्ण उपाय है, वह है उसे स्वीकार ही न करना। जब तक आप स्वीकार नहीं करेंगे, आप बूढ़े हो ही नहीं सकते और ये स्वीकृति होती है मन से। मन में हमेशा युवा बने रहेंगे तो न बुढ़ापा दस्तक देगा और न शारीरिक कमजोरी।
किसी व्यक्ति को देखने मात्र से उसकी वास्तविक उम्र का पता नहीं चलता। कुछ लोग कम उम्र में ही वृद्ध नजर आने लगते हैं, तो कुछ रिटायरमंट के बाद भी युवा नजर आते हैं। इसका कारण है उनकी शारीरिक बनावट और आनुवंशिकता के साथ-साथ उनका बुढ़ापे के प्रति दृष्टिकोण या मन:स्थिति। यदि हम उम्र की बात करें तो वह भी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है। एक होती है शारीरिक उम्र तथा दूसरी होती है मानसिक उम्र। इसी प्रकार वृद्धावस्था भी शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह की होती है। शारीरिक वृद्धावस्था को मन की शक्ति द्वारा रोकना संभव है लेकिन जो मन से बूढ़ा हो गया, उसका कोई उपचार नहीं।
भारत-रत्न से सम्मानित डॉ. मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया ने सौ वर्ष से अधिक की आयु पाई और अंत तक सक्रिय जीवन व्यतीत किया। एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, 'आपके चिर यौवन का रहस्य क्या है?' डॉ. विश्वेश्वरैया ने उत्तर दिया, 'जब बुढ़ापा मेरा दरवाज़ा खटखटाता है तो मैं भीतर से जवाब देता हूं कि विश्वेश्वरैया घर पर नहीं है। और वह निराश होकर लौट जाता है। बुढ़ापे से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पाती तो वह मुझ पर हावी कैसे हो सकता है?'
जैसा मन वैसा तन। जब कोई बूढ़ा न होने की ठान लेता है तो वह चिर युवा बना रहता है और अंत तक सक्रिय व सक्षम भी। वस्तुत: मनुष्य उतना ही बूढ़ा या जवान है, जितना वह अनुभव करता है। बुढ़ापा तन का नहीं, मन का होता है। मन जवां तो तन जवां। आप की सोच इस दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण है, अत: सोच में सकारात्मक परिवर्तन द्वारा सदैव युवा बने रहें और सक्रिय जीवन व्यतीत करें। वैसे भी यदि आप सक्रिय जीवन व्यतीत करते हैं, तो बुढ़ापा पास नहीं फटकता।
दीपक चोपड़ा कहते हैं कि बढ़ती उम्र के अहसास को परिवर्तित करके, विषाक्त मनोभावों तथा आदतों से छुटकारा पाकर, जीवन में सक्रियता अथवा क्रियाशीलता बनाए रखकर, जीवन में लचीला होने की विधि सीखकर तथा अपने जीवन में प्रेम को अत्यधिक महत्वपूर्ण तत्त्व बनाकर हम सदैव युवा बने रह सकते हैं।
प्रकाशन तिथि: नवम्बर 05, 2008
कृपया इस सार का मूल्यांकन करें : 1 2 3 4 5

टिप्पणियाँ

  1. 0 समीक्षा 29 अगस्त 2009
    1

    loksangharsha

    read

    nice

Bookmark & share this post

.