इतना जहर कहां से आ गया मेरे भाई ! मुंबई लोकल जो हर
उस आम आदमी को जोड़ने का काम करती थी जो अजनबी होकर भी जाना पहचाना रहता था। दो शब्द,
एक हल्की मुस्कान, थोड़ा सा सहारा बस इतना ही काफी होता है इस मुंबई लोकल के भीड़ भरे डब्बे में दोस्ती के लिए। चंद मिनटों के इस सफर में आपको कुछ चेहरे अपने होने का एहशास करा देते हैं लेकिन
धर्मदेव की मौत के बाद इन सारी बातों पर एक सवालिया निशान लग गया है?
सरकार कहती है सीट के लिए मारपीट हुई। विश्वास नहीं होता कि ऐसा मुंबई लोकल की किसी ट्रेन में हो सकता है। मुंबई लोकल में यात्रा कर चुका शायद ही कोई यात्री हो जो राज्य सरकार की इस बात पर विश्वास कर सके। अपनी-अपनी मंजिलों पर अपने सपनो के साथ निकलने वाले लोग, आखिर कैसे यकीन कर ले की उस भीड़ में कुछ लोगों ने एक सीट के लिए एक व्यक्ति को मौत के घाट उतार दिया। इतना जहर आखिर दिलों में किसने और कब घोल दिया? यह एक ऐसा यक्ष प्रश्न है जो हर उस आम यात्री के जेहन में होगा जो इस लोकल में सवारी कर चुका होगा।
मुंबई लोकल तो हर उस आम आदमी की जीवन रेखा के समान मानी जाती है जो इस सपनो की नगरी में रह रहा होता है और वो नाम और पता नहीं पूछती। फिर धर्मदेव के साथ ऐसा क्यों हुआ? इतना जहर कहां से आ गया मेरे भाई जो इन दिलों में इंसानियत को भी नहीं समझ पाया? ये कैसी नफरत की आग है? ग्लोबलाइज विलेज में दौड़ रहे इस महानगर को आखिर किसकी बुरी नजर लग गई? आखिर ये सब है क्या?