bachchon ne everest ganth liyaa...
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प्रकाशन तिथि: नवम्बर 22, 2007
हास्य-व्यंग्य बच्चों ने एवरेस्ट गांठ लिया....
पहले बच्चों पर गया था किसी का ध्यान? नहीं गया था.......चलों मान लेते है कि अपने बच्चों का ध्यान, उनके मां-बाप रखते ही थे...पर क्या बाज़ार वाले रखते थे? पडोसी रखते थे? नहीं रखते थे.पर अब जमाना बदल गया है. चलो देर आए दुरस्त आए, बच्चों की अहमियत कार्पोरेट जगत के समझ में तो आ ही गई है!
जहां देखो वहां... बच्चों को खडा किया जाता है.चाहे मोबाईल फोन की एड हो या फ्रिज़ की हो...चाहे टूथपेस्ट हो या सिरदर्द की दवाई...चाहे वाशिंग मशिन हो या कंप्युटर...सब जगहों पर बच्चों की पहुंच है. अरे! बच्चों के बगैर विञापन अब अधुरा लगने लगा है.
इसका मुख्य कारण है...बच्चों की हर मांग पूरी होना! जिसकी हर मांग पूरी होती हो,भला उसकी अहमियत भी तो गगन छुएगी और वह एवरेस्ट तो गांठेगाही! बच्चों के वारे-न्यारे तो मां-बाप के भी ऑटोमेटिकली वारे-न्यारे!... नहीं समझे?... जल्दी कीजिए,कोई भी एड देख लीजिए!