जीतने की कला
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प्रकाशन तिथि: नवम्बर 08, 2007
रामायण का एक मशहूर पात्र था बाली..वानर वंश के इस प्रतापी राजा की खूबी थी कि जब कभी इसका कोई प्रतिद्वंद्वी सामने आकर उसे युद्ध के लिए ललकारता था...तो बाली पलक झपकते दुश्मन पर टूट पड़ता था...और, बाली कभी हारता नहीं था...आखिर ऐसा क्या था बाली में जिसने उसे अविजित बना रखा था..यह राज बाली के छोटे भाई और उसके प्रबल दुश्मन सुग्रीव ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सामने तब खोला जब श्रीराम सुग्रीव की तरफ से बाली का संहार करने गये थे..सुग्रीव ने श्रीराम को सलाह दी कि किसी भी हालत में बाली के सामने आकर उस पर वार मत कीजिएगा...क्योंकि, बाली को वरदान है कि जो कोई भी दुश्मन उसके सामने आएगा..उसकी आधी ताकत बाली को अंदर आ जाएगी..श्रीराम ने इस सलाह पर अमल करते हुए एक पेड़ के पीछे छुपकर बाली पर तीर चलाये...और बाली मारा गया..हांलाकि, छुप कर दुश्मन की हत्या करने का पाप भी श्रीराम पर चढा और उन्हे खासी आलोचना का शिकार भी बनना पड़ा..बहरहाल, हम यहां उस भेद पर चर्चा करने की कोशिश करेंगे कि कैसे बाली अपने दुश्मन से आधी ताकत खींच लेता था...मेरा मानना है कि इस ताकत के पीछे बाली का वह एटीच्यूड या मनोभाव जिम्मेदार था जिसे बाली ने खासी साधना के बल पर अर्जित किया था...अमूमन हम जब किसी प्रतिस्पर्धी या दुश्मन के सामने पड़ते ही गुस्से या नफरत की उमड़ती प्रचंड लहरों के सैलाब में बह जाते हैं..हमारा दिमाग उस वक्त वर्तमान से अधिक अतीत के उन पन्नों को खंगालने लगता है जिसमें उस प्रतिस्पर्धी ने तमाम तरह से हमारा नुकसान करने की कोशिश की...अतीत की यादें हमारे जहन को इतना जहरीला कर देती हैं कि हम अपना आपा खोकर दुश्मन पर टूट पड़ते हैं..होश खोकर किया गुस्सा अक्सरहां हमारे सोचने की शक्ति छीन लेता है और अमूमन हमारे दांव इतने कमजोर पड़ जाते हैं कि हम अपने से कमजोर दुश्मन से भी या तो हार जाते हैं या उससे भय खाने लगते हैं...अब इसकी जगह यदि हम अपनी रणनीति बदल लें... यानी अतीत को भूलकर सिर्फ वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करें तो... जाहिर है कि हम गुस्से की उस प्रचंड धारा में बहने से बच जाएंगे जो उस वक्त हमारा होश छीन लेती है...अब इसके साथ ही यदि हम यह सोचें कि सामने वाला प्रतिस्पर्धी वस्तुत:हमारा शुभचिंतक है जो हमारी शारीरिक और मानसिक ताकत की परीक्षा लेने आया है..ताकि वक्त के साथ हम और मजबूत होकर उभड़ें...तो ऐसी सोच का क्या असर होगा...दुश्मन पर इसका प्रत्यक्ष असर पड़े या नहीं...हम पर तो निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा...प्रबल दुश्मन के सामने भी हमारी सोच भावना के सैलाब में नहीं बहेगी..हम उस वक्त ठंडे दिमाग से अपना फैसला ले पाएंगे...दुश्मन की कमजोरी को सही ढंग से भांप पाएंगे...और उसे पराजित करने का अचूक फार्म्यूला उपाय में ला पाएंगे..जाहिर है कि इसके नतीजे भी हमें सकारात्मक ही मिलेंगे..अगर हमने होश बना रखा है और दुश्मन होश खो चुका है तो इसका फायदा किसे मिलना है क्या यह भी बताने की बात है..