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पहलवान(तद्भव मासिक)

Summary rating: 5 stars 3 समीक्षा
Review by : Mahendra Yadav
विजिट्स: 361
शब्द: 300
प्रकाशन तिथि: मार्च 09, 2007
चर्चित कथाकार दूधनाथ सिंह की कहानी पहलवान, साहित्यिक पत्रिका तद्भव के अक्टूबर अंक में छपी है। गांव में एक पहलवान है, जिसे तमाम दूसरे पहलवान लाख तरीके अपनाकर भी हरा नहीं पाते। दो गांवों के बीच सालाना दंगल प्रतिष्ठा की बात रहती है लेकिन सालों से जीत उसी नामी पहलवान की होती है। दूसरे गांव के लोग काफी परेशान हैं। उन्हें संदेह है कि उस पहलवान के पास कोई शक्ति या जादूई ताकत है,जिसके सहारे वह हर दंगल जीत लेता है। कई लोग उसे हराने के उपाय सोचते हैं लेकिन कोई कारगर तरीका समझ में नहीं आता।आखिरकार एक बूढ़ा आदमी बताता है कि उसके पास एक तरीका है,जिसे अपनाकर उस पहलवान को हराया जा सकता है। लोग पूछना चाहते हैं लेकिन बूढ़ा कहता है कि तरीका दंगल के दिन ही बताएगा।खैर, दंगल का दिन आ जाता है और नामी पहलवान दंगल में उतरकर दूसरे गांव के पहलवानों को ललकारता है। तभी दूसरे गांव की तरफ से एक हिजड़ा मैदान में आकर नामी पहलवान को ललकारता है। अब पहलवान को समझ में नहीं आता कि वो क्या करे। हिजड़ा अखाड़े में उतरकर नामी पहलवान को चुनौती देता है लेकिन पहलवान कुछ नहीं कर पाता क्योंकि एक हिजड़े से लड़ना या उस पर वार करना परंपरा के ही नहीं बल्कि उसकी शान के ही खिलाफ है। पहलवान कुछ नहीं कर पाता और अपनी हार मानकर अखाड़े से बाहर चला जाता है।
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