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हंस

Summary rating: 4 stars 8 समीक्षा
Review by : Mahendra Yadav
विजिट्स: 402
शब्द: 300
प्रकाशन तिथि: मार्च 08, 2007
जेम्स बांड की नई फिल्म के भारत में रिलीज़ होने और भारतीय मीडिया में उसे मिल रहे अत्यधिक कवरेज को यहां की गुलाम मानसिकता का ही प्रतीक कहा जा सकता है। हॉलीवुड और पश्चिमी बाज़ार की मार्केंटिंग की रणनीति इतनी भयंकर और आक्रामक होती है कि उसके सामने भारतीय मीडिया को कुछ समझ में नहीं आता और वह उसके लिए पलक-पांवड़े बिछा देता है। ये तो वह सोच ही नहीं पाता कि इस सबके पीछे गोरी साम्राज्यवादी मानसिकता छिपी है। जेम्स बॉन्ड करेक्टर का उदय उस समय हुआ था, जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज डूब रहा था। जेम्स के बहुप्रचारित चरित्र का भारतीय मीडिया कितना भी स्वागत करे लेकिन ये सत्य है कि जेम्स गोरी नस्लवादी मानसिकता का ही प्रतीक है। उसके सारे कारनामे यही साबित करते हैं कि ऐसे साहसिक और दिमाग वाले काम उसके और उसकी नस्ल के लोग ही कर सकते हैं। सम्मान होगा तो गोरी चमड़ी वाले लोगों का ही होगा। भारतीय मीडिया ये समझे बगैर हॉलीवुड के अभिनेता- अभिनेत्रियों का स्वागत करता रहता है। हॉलीवुड का कोई भी स्टार भारत आया नहीं कि टीवी चैनल वाले सारे काम छोड़कर उसके पीछे पड़ जाते हैं। एंजेलीना जॉली जब भारत आई तो मीडिया वाले उसके अंगरक्षकों से अपमान और मार-पिटाई सहकर भी उसके पीछे लगे रहे।जेम्स बॉन्ड के पोते, शीर्षक का ये लेख जाने माने टीवी पत्रकार मुकेश कुमार ने लिखा है और हिंदी की मशहूर सामाजिक-वैचारिक पत्रिका हंस ने प्रकाशित किया है। खुद मुकेश कुमार कई टीवी चैनलों में उच्च पदों पर काम कर चुके हैं और टीवी चैनलों की मानसकिता को बखूबी जानते हैं। उनके लेख में कही गई बातें एकदम वास्तविक ही हैं। हंसपत्रिका में इस समय हर माह वो मीडिया के बारे में लेख लिख रहे हैं,जो पढ़ने योग्य होते हैं।
हंस         
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