Loktej
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प्रकाशन तिथि: सितम्बर 03, 2006
उत्सव मनाएं लेकिन उसे अंजाम तक भी पहुंचाएं
भारत देश त्यौहारों और उत्सवों का देश है। भारत में जितनी भाषा और सभ्यताओं की जितनी विविधा है, उतने ही एक से बढ़ कर एक त्यौहार और उत्सवों की भरमार भी है। इन दिनों गुजरात और महाराष्ट्र में गणेशोत्सव बड़े धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। मैं भी बड़े चाव से हम जिस कोलोनी में रहते हैं वहां होने वाले गणेशोत्सव के आयोजन में हिस्सा लेता हूं। पिछले पांच दिनों से हम बड़े हर्षोल्लास के साथ गणेशजी के रंग में रंगे हुए हैं। यूं तो गणेशोत्सव दस दिनों का होता है लेकिन पांचवे दिन गणेशजी की छोटी प्रतिमाओं का विसर्जन 'गौरी-गणेश' विधि के भाग स्वरूप कर दिया जाता है। हमारे यहां भी पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ गौरी गणेश का विसर्जन नदी में किया गया। क्योंकि इन दिनो दैनिक दिनचर्या में गणेशजी रमे हुए हैं, ऐसे में लोकतेज की वेइसाईट लोकतेज.कोम पर मुंबई के समुद्री किनारे पर गणेशजी की खंडित प्रतिमा की बगैर विसर्जन की गई मूर्ति की तस्वीर इस कैप्शन के साथ नजर आई कि उत्सव मनाएं लेकिन उसे अंजाम तक भी पहुंचाएं। सचमुच जहां यह कैप्शन को दिल को झकझोरने वाला था, वहीं यह सोचने को विवश भी कर रहा था कि वर्तमान भौतिकावादी युग में हमने हमारी परंपराओं को भी व्यावसायिकता का चोला पहना दिया है। जब तक काम है तब तक देखभाल करो और काम निकल जाय तो फैंक दो। जब तक एक परंपरा के रूप में गली-महोल्लों में गणेशजी की प्रतिमा की स्थापना करनी है, उसकी पूर्जा-अर्चना करो, उत्सव मनाओ और विसर्जन के बाद अगले वर्ष तक गणेशजी और उनके बताये रास्तों को भूल जाओ। अरे, ऐसा करें तो भी समझ में आता है तब बड़ा दुख होता है जब हम जिनकी पूर्जा-अर्चना बड़े चाव से करते हैं, ऐसी गणेश प्रतिमा को सही ढंग से विसर्जित किये बगैर ही समुद्री या नदी किनारे पटक कर चले आते हैं, जैसा तस्वीर में साफ झलक रहा था। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि हमें उत्सव मनाने चाहिये लेकिन उन्हें उसके चरम तक भी पहुंचाना चाहिये। अन्यथा उत्सव दिखावा बन कर रह जाते हैं और श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस भी पहुंचती है।