बाढ़ को अक्सर प्राकृतिक आपदा के तौर पर देखा जाता है, पर वास्तव में यह इंसान के द्वारा प्रकृति के साथ का नतीजा ही होता
है। हमारे देश के कई हिस्सों में बाढ़ का सिलसिला साल दर साल चलता ही आ रहा है।
केन्द्रीय जल आयोग के आंकड़ों को देखें तो 1953 से 2007 तक औसतन हर साल 1,597 लोगों को बाढ़ के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है जबकि औसतन 1817.07 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति हुई है।
बिहार भारत का ऐसा हिस्सा है जो हर साल बाढ़ से प्रभावित होता है। कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला बलान, महानंदा और अधवारा नदियों का हर साल नेपाल से तबाही का पानी लाती बनता हैं।
वर्ष 2008 वैसे तो बिहार में बाढ़ कोई नई बात नहीं है लेकिन इस साल बाढ़ ने पिछले 48 साल का रिकॉर्ड तोड़ विभीषिका का रूप ले लिया है। यह पता लगाना मुश्किल है कि अभी तक कितने लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं लेकिन यह बात तय है कि स्थिति बदतर है। अररिया, पूर्णिया, मधेपुरा और सुपौल में कहीं ऐसी जगह नहीं है जहां बाढ़ का पानी न पहुंचा हो।
बाढ़ प्रभावित इलाकों में संपत्ति, फसलों, मवेशियों के नुकसान का पता लगाना मुश्किलहै। बाढ़ से डरे लोगों का पलायन शुरू हो चुका है। 1985 से ही नदी के बांधों पर मिट्टी जमा होने से भारी दबाव पड़ रहा था। जलग्रहण क्षेत्र में मिट्टी के जमाव को रोकने के बजाय अधिकारी हर साल बांध को मजबूत बनाने में जुटे हुए थे। अब जब बाढ़ ने राल रूप धारण कर लिया है तो इंजीनियर तमाम कोशिशें कर के भी दरारों को बंद नहीं कर पा रहे हैं। हजारों लोग इस खूनी पानी की चपेट में आकर मौत के मुह में समा चुके हैं और हजारों अभी भी लापता हैं।
जिन इलाकों में अभी बाढ़ का पानी नहीं पहुँचा है वहाँ के लोगों ने भी इस डर से सामान बांध लिया है कि पता नहीं कब उनके घर भी पानी में डूब जाएं।