Dainik jagran
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प्रकाशन तिथि: जनवरी 14, 2008
कलंकित हुआ क्रिकेट
भारत में क्रिकेट को एक खेल के रूप में नहीं बल्कि धर्म के रूप में माना जाता है। आज रविवार को सिडनी में उसी क्रिकेट के धर्मराजों यानि अंपायरों ने उसे कलंकित कर दिया। क्रिकेट इतिहास में इस रविवार को भारतीय क्रिकेट काले दिन के रूप में याद किया जाएगा। जहां एक ओर भारतीय टीम को दूसरे टेस्ट में साजिशन हार का सामना करना पड़ा। वहीं स्टार आफ स्पिनर हरभजन सिंह को आस्ट्रेलियाईबेस आईसीसी ने बगैर किसी सबूत एवं गवाह के तीन टेस्ट मैचों के लिए प्रतिबंधित कर दिया।
क्रिकेट में अंपायरों को धर्मराज का दर्जा हासिल है। वह जो भी फैसला देते हैं, उसे खिलाड़ी सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं। चाहे वह गलत हो या सही। अंपायरों को निष्पक्ष कहा जाता है। मगर सिडनी में भारत और आस्ट्रेलिया के बीच 2 से 6 जनवरी के पांच दिनों में जो कुछ भी घटित हुआ वह काफी घृणित था। जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के एलीट पैनल के दो श्रेष्ठ अंपायरों, वेस्टइंडीज के स्टीव बकनर और इंग्लैंड के मार्क बेनसन ने एकतरफा भारत के खिलाफ पूरे मैच में छोटे, बड़े और बहुत बड़े मिलाकर लगभग 10 गलत फैसले दिए। उसने क्रिकेट के इन धर्मराजों को स्वयं कटघरे में ला खड़ा किया है। हद तो तब हो गई जब अंपायरों के साथ इस घृणित कार्य में स्वयं आस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग, उपकप्तान एडम गिलक्रिस्ट और भावी कप्तान माइकल क्लार्क भी शामिल हो गए। उन्होंने राहुल द्रविड़ व सौरव गांगुली को जानते-बूझते हुए भी आउट देने की सिफारिश अंपायर बेनसन से कर दी। जबकि मौके की नजाकत को देखते हुए अंपायर को स्क्वाएर लेग अंपायर या फिर थर्ड अंपायर से राय मांगनी चाहिए थी।
कहने को तो आस्ट्रेलियाई विश्व चैंपियन एवं अजेय हैं। मगर जिस तरह रवैया अंपायरों के साथ-साथ रिकी पोंटिंग और उनके साथियों ने इस मैच में स्वयं को हार से बचाने तथा भारत को पराजय के मुंह धकेलने के लिए अपनाया उसने उन्हें इस भद्रजनों के खेल में सबसे अभद्र टीम बना दिया है। इस तरह साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाकर तो कोई भी टीम अजेय बनी रह सकती है।
यह पहली बार नहीं है कि जब आस्ट्रेलियाई टीम ने जीत के लिए बाई हुक आर क्रुक वाला फार्मूला अपनाया हो। इसके पहले सन 2004 में इसी सिडनी मैदान पर तत्कालीन कप्तान स्टीव और साइमन काटिच को इन्हीं अंपायर बकनर ने नाटआउट देकर आस्ट्रेलिया को न केवल उक्त टेस्ट मैच में हार से बचाया था बल्कि भारत को ऐतिहासिक सीरीज जीतने से भी वंचित कर दिया था। सोचने वाली बात यह है कि आस्ट्रेलिया में सारे निर्णय भ्रमणकारी टीम के ही खिलाफ क्यों जाते हैं। वेस्टइंडीज के स्टार बल्लेबाज एवं पूर्व कप्तान शिवनारायण चंद्रपाल ने एक बार इसी तरह के गलत निर्णयों का शिकार होने के बाद कहा था इस तरह के गलत फैसलों में से यदि आधे मेहमान टीम के हक में हो जाए तो आस्ट्रेलिया कभी विश्व चैंपियन टीम नहीं बन पाए।
आस्ट्रेलियाई टीम का जीत के लिए किसी भी हद तक गिर जाना, आज की नहीं बहुत पुरानी आदत है। उन्होंने यह रवैया अस्सी के दशक (1981) में ही शुरू कर दिया था। जब कप्तान ग्रेग चैपल ने अपने सबसे छोटे भाई ट्रेवर चैपल से न्यूजीलैंड के खिलाफ जीत के लिए अंडर आर्म गेंदबाजी तक करवा दी थी। न्यूजीलैंड को यह मैच जीतने के लिए आखिरी गेंद पर 6 रनों की दरकार थी। ग्रेग चैपल की इस हरकत के बाद आईसीसी को अपने नियमों में बदलाव तक करना पड़ा था। उन्हें इसके बाद इंग्लिश मीडिया ने अगली आस्ट्रेलियाई की संज्ञा दे डाली थी। आज फिर वही स्थिति आ चुकी है। अब आईसीसी को फिर से नियमों में बदलाव की आवश्यकता आन पड़ी है। फैसलों के लिए तकनीक के और इस्तेमाल के साथ-साथ अब खिलाड़ी भी अंपायरों के गलत फैसले के खिलाफ अपील कर सकेंगे। चैंपियंस ट्राफी में ऐसा प्रयोग के तौर पर होगा।
बहरहाल अब भारतीय क्रिकेट को पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष जगमोहन डालमिया जैसे तेज तर्रार अधिकारी की जरूरत है। जो आस्ट्रेलियाई वर्चस्व वाली आईसीसी से भिड़ सके। यह डालमिया ही थे, जिन्होंने 2001 में दक्षिण अफ्रीका में इंग्लैंड के माइक डेनेस (मैच रेफरी) और आईसीसी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पोर्ट एलिजाबेथ में ड्रा समाप्त हुए उक्त दूसरे टेस्ट मैच में भारत के खिलाडि़यों को प्रतिबंधित कर दिया गया था। यह डालमिया की ही ताकत थी, जो उन्होंने आईसीसी को विश्व क्रिकेट के दो फाड़ कराने की धमकी देकर झुका दिया। मालूम हो कि माइक डेनेस ने सचिन तेंदुलकर पर बाल टेंपरिंग का आरोप लगाने के साथ-साथ अधिक अपील करने पर भारत के छह खिलाडि़यों पर प्रतिबंध लगा दिया था। डालमिया के विरोध ने न केवल इन खिलाडि़यों के ऊपर से प्रतिबंध हटवाया था बल्कि उक्त टेस्ट मैच का रिकार्ड भी रिकार्डबुक से हटाने के लिए आईसीसी को मजबूर कर दिया था।