खत्म हुआ जब द्रोणा का इंतजार....
द्रोणा का इंतजार खत्म हुआ।...द्रोणा फिल्म आखिर रिलीज हो ही गई। हमारे चहीते हीरो अभिषेक
बच्चन को देखने के लिए आंखे तरस रही थी...उनकी मम्मी जया बच्चन को भी हम जी भर कर देखना चाहते थे....देख लिया।
देख लिया गोल्डी बहल को भी...जो अच्छी फिल्में देने में माहीर होने का दम भरते थे।... बेचारे 'द्रोण' बनाकर हमारी आशाओं पर पानी फेरने के सिवा कुछ न कर सकें।...उनका नुकसान तो हमारे से कई गुना ज्यादा हुआ।...खै॑ उनकी नुकसान भरपाई शायद हो भी जाएगी....लेकिन हमारी आशाओं पर जो पानी फिर गया उसकी नुकसान भरपाई कैसे होगी?
द्रोणा को अभिषेक बच्चन ने शायद 'बंटी और बबली' समझ लिया। उन्हों ने जरुर सोचा होगा कि 'वो फिल्म चल गई...तो इस फिल्म को चलने से कौन रोक सकता है?' ...लेकिन वे भूल गए कि पब्लिक में समझदारी और अच्छी बुरी कहानियां समझने की शक्ति भी होती है। जादू-टोने की भरमार पब्लिक को एक हद तक ही बेवकूफ बना सकती है। जादू टोने के साथ साथ कुछ अकलमंदी का इस्तेमाल कहानी में किया जाता तो फिल्म चल तो क्या...दौड भी सकती थी।
प्रियंका चोपडा ने भी कहानी के आगे घुंट्ने टेक दिए।...फिर भी अच्छा अभिनय दिखा कर अपने लिए पूरे नंबर ले गई।...यही काम मम्मी जया बच्चन ने भी कर दिखाया।...अभिनय की ज्योत उनके अंदर अब भी जल रही है, यह उन्हों ने साबित कर दिखाया।...खैर॑ हम तो अभिषेक बच्चन की सभी फिल्में देखने वालों में से है... उन्हों ने बहुतसी फिल्में जैसे कि 'गुरु' ....अपने अभिनय के बलबूते पर 'हिट' की कैटेगरी में डाल दी है।...यह भूलना हमारे लिए वाकई मुश्किल है।
....तो द्रोण के साथ ऐसा अन्याय क्यों कर हुआ?...इसके लिए हम आपको द्रोण देखने की सलाह दे रहे है।...देखिए शायद आपकी राय हमारी राय से न भी मिले।