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फिल्म 'वास्तव' की..यही है वास्तविकता!
फिल्म 'वास्तव' की..यही है वास्तविकता!
संजय दत्त के इर्द=गिर्द कहानी घुमती है!... ये एक गरीब घर से ताल्लुकात
रखनेवाला लड्का है!.. इस्के माता-पिता ईमानदार, ईश्वर्में आस्था रखनेवाले, मेहनत की रोटी कमाकर खाने में यकीन रखने वाले सीधे-सादे इन्सान है!.... जाहीर है कि वे अपने बच्चों को भी ईमानदारी से जीवन-यापन करने की तालिम ही देंगे!
... हुआ भी ऐसा ही.... लेकिन यह तालिम संजय दत्त के काम नही आई.... परिस्थिती को लेकर या जैसे भी हो, संजय दत्त एक अपराधी बन बैठा!... गलत संगत में फंसकर गलत काम करने में लिप्त हो गया... वेश्याओके कोठे पर जाने लगा.... जितनी भी बुराइयां अपना सकता था; इसने अपना ली.... किसीका खून करना इसके बाये हाथ का खेल बन गया!
.... अब यह अपने माता-पिता का घर छोड कर किसी अच्छी जगह पर भी रहने लगा... सभी सुविधाएं इसके रहन सहन में शामिल हो गई.... इसके पास करोडो में धन-दौलत जो आ गई. यह एक बब्बन राव कदम नाम के चीफ मिनीस्टर के लिए काम करने लगा...लेकिन इस फिल्म के कथानक के अनुसार संजय दत्त को नायक, याने की अच्छा आदमी भी दिखाना जरुरी था!
... सो संजय दत्त एक कोठे वाली से शादी भी कर लेता है, जो अच्छी औरत साबित हो जाती है!... एक बेटा भी इसके यहां पैदा हो जाता है!... इसके बावजूद इसका खूनी खेल जारी है!... समझ नहीं आ रही कि कहानीकार इसे फिर भी अच्छा आदमी क्यों दिखाना चाहता है!
.... क्या एक ही व्यक्ति का रंग गोरा और काला हो सकता है?... क्या एक ही हाथ में आग और पानी कोई पकड सकता है?..... क्या एक ही मनुष्य लंबा और नाटा भी हो सकता है?.... यही बडी गलती इस फिल्म में नजर आ रही है!... संजय दत्त को अच्छा और बुरा एक साथ दिखाने की चेष्टा की गई है!... आखिर में बुरे चीफ मिनिस्टर को परेश रावल मार गिराता है.... परेश रावल संजय दत्त का हमदर्द बना हुआ है!.... अभिनय सभी कलाकारों का बेहतरीन है!... संजय दत्त का अंत कैसे होता है...या नहीं होता इसका राज खोलना यहां बिन-जरुरी है!
.... फिल्म कहानी की विचित्रता के बावजूद भी अच्छी बन पडी है... एक से ज्यादा बार भी देखी जा सकती है!
प्रकाशन तिथि:
सितम्बर 29, 2009
ambalika के द्वारा और अधिक संक्षेपण
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