भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों की सबसे ज्यादा कोशिश तीसरे मोर्चे को कमजोर करने की है। इसके लिए ये दोनों
एक दूसरे से हार मानने को तैयार हैं। बस, किसी भी कीमत पर कोई तीसरा मोर्चा वजूद में न आ पाए। इसी उधेड़बुन में ये लगी हैं। भाजपा किसी भी तरह से इस बार सत्ता में नहीं आती दिख रही है। उसकी सीटें कम होते ही एनडीए में टूट होने जा रही है। ऐसी स्थिति में उसका साथ
शिवसेना भी छोड़ सकती है( अगर शरद पवार के प्रधानमंत्री बनने के अवसर बनें तो) और जनता दल यूनाइटेड भी, जो मजबूरी में ही उसे साथ लिए है। कांग्रेस भी चाहती है कि अगर जेडी यू की सीटें ज्यादा आती हैं तो वह राष्ट्रीय जनता दल की जगह उसे यूपीए में शामिल कर ले। जेडीयू के नेता भी इसके इच्छुक है, बस दिक्कत ये है कि बिहार की सरकार कांग्रेस के
समर्थन से नहीं चल पाएगी क्योंकि कांग्रेस की सीटें बिहार में बहुत कम हैं।
इस बार कांग्रेस की भी हालत खस्ता है। कुल मिलाकर चांस यही बन रहे हैं कि बाकी सारे दल मिलाकर एक वृहद मोरचा बनाएंगे और कांग्रेस उसका समर्थन करे। यह भी संभव है कि शिवसेना और जेडीयू बाहर से समर्थन करें... एक दूसरे से हार मानने को तैयार हैं। बस, किसी भी कीमत पर कोई तीसरा मोर्चा वजूद में न आ पाए। इसी उधेड़बुन में ये लगी हैं। भाजपा किसी भी तरह से इस बार सत्ता में नहीं आती दिख रही है। उसकी सीटें कम होते ही एनडीए में टूट होने जा रही है। ऐसी स्थिति में उसका साथ शिवसेना भी छोड़ सकती है( अगर शरद पवार के प्रधानमंत्री बनने के अवसर बनें तो) और जनता दल यूनाइटेड भी, जो मजबूरी में ही उसे साथ लिए है। कांग्रेस भी चाहती है कि अगर जेडी यू की सीटें ज्यादा आती हैं तो वह राष्ट्रीय जनता दल की जगह उसे यूपीए में शामिल कर ले। जेडीयू के नेता भी इसके इच्छुक है, बस दिक्कत ये है कि बिहार की सरकार कांग्रेस के समर्थन से नहीं चल पाएगी क्योंकि कांग्रेस की सीटें बिहार में बहुत कम हैं।
इस बार कांग्रेस की भी हालत खस्ता है। कुल मिलाकर चांस यही बन रहे हैं कि बाकी सारे दल मिलाकर एक वृहद मोरचा बनाएंगे और कांग्रेस उसका समर्थन करे। यह भी संभव है कि शिवसेना और जेडीयू बाहर से समर्थन करें...