भारत में प्रेसीडेंट चुनाव का तमाशा
Summary rating: 4 stars
3 समीक्षा
विजिट्स:
352
शब्द:
600
प्रकाशन तिथि: जुलाई 16, 2007
ऐसा कभी नहीं हुआ। और शायद होगा भी नहीं। सबसे अहम भारतीय पद को हथियाने के लिए राजनीतिक दलों में जिस तरह मारामारी मची है उससे भारतीय जनता स्तब्ध है। चुनाव जीतने की कगार पर पहुंच चुकी यूपीए की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल शायद इसलिए याद न की जाएं कि वो भारत की प्रथम महिला प्रेसीडेंट थीं मगर उन्हें इस पूरे विवाद के लिए याद जरुर किया जाएगा। प्रेसीडेंट चुनावों की इस गणित में मौजूदा प्रेसीडेंट एपीजे अबुल कलाम की भी किरकिरी हुई है। उन्हें पद का लालची बताया गया, ये आलोचना उन्हीं लोगों ने की जिन्होंने श्री कलाम को भारत रत्न देने की जोरदार वकालत की थी। फिलहाल इस तमाशे में सारी जोर आजमाइशें की जा रही हैं, इनमें संपत्ति का सार्वजनिक किया जाना भी शामिल है इसके मुताबिक एनडीए उम्मीदवार और उपराष्टपति भैरों सिंह शेखावत के पास महज 26 लाख रुपये की संपत्ति है। जबकि प्रतिभा पाटिल करोडों की मालिकिन हैं। उन पर कई आरोप भी लगे हैं मगर वो चुपचाप अपना रास्ता तय किए जा रही हैं। भारत में प्रेसीडेंट चुनावों में जनता की भूमिका नहीं होती। सत्तारुढ और विपक्षी दल इसका फैसला करते हैं। प्रतिभा पाटिल का नाम आने से पहले कई दूसरे नाम प्रेसीडेंट बनने की दौड में थे। लेकिन आखिरी वक्त में खेल बदल गया। एक गुमनाम नाम पर यूपीए की सहमति हो गई। यूपीए उम्मीदवार जीत भी जाएगा मगर भारतीय जनता प्रेसीडेंट कलाम को नहीं भूलेगी जिनकी एक बार फिर प्रेसीडेंट बनने की इच्छा को बेदर्दी से ठुकरा दिया गया। इस तथ्य को मानने के बावजूद की कलाम की लोकप्रियता का कोई सानी है। कलाम का पत्ता यह कहकर काटा गया कि आजाद भारत में पहले प्रेसीडेंट राजेंद्र प्रसाद के अलावा किसी को दूसरा कार्यकाल नहीं मिला। लेकिन सोचना होगा कि क्या एक घिसी पिटी परंपरा को जीवित रखने के लिए कलाम जैसे रत्न की उपेक्षा सही है। भारत के अगले प्रेसीडेंट के लिए चुनावी खानापूर्ति जल्द ही हो जाएगी, नए प्रेसीडेंट का चुनाव हो जाएगा लेकिन भारतीय जनता अपने पुराने प्रेसीडेंट कलाम को हमेशा याद रखेगी।