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अपने पति को मार दो (अंतिम)

लेखक : troubleshootar
संक्षेपक : troubleshootar
विजिट्स : 38  शब्द: 900   प्रकाशन तिथि: अप्रैल 25, 2008

``लेकिन मेरे पापा ने तो.....।´´

``छोड़ो।´´ वह बोला,`` उस समय मेरी कोई मजबूरी थी।´´

``अब यदि मैं तुमसे विवाह करना चाहूं तो।´´ मैंने हसरत भरी निगाहों से उसके चेहरे को ताकते हुये पूछा।

``अपने पति के मरने का इंतजार करो।´´ वह सड़क पर निगाह जमाये हुये बोला,``मैं सिर्फ तुमसे ही विवाह करूंगा।´´

जब वह कभी इस तरह बातें करता था तो मुझे उससे खतरा महसूस होने लगता था परंतु फिर भी उसे पाने की जिद मेरी हर सोच को दबा दिया करती थी।

और फिर मैंने एक नासमझी भरा कदम उठा दिया। एक ऐसी हरकत मैंने की जो मुझे नहीं करनी चाहिये थी। मैंने अपने पति को अपनी कार में बैठाया और सोची समझी स्कीम के तहत एक एक्सीडेंट किया। एक ऐसा एक्सीडेंट जिसमें मेरे पति की जान जाना अवश्यांभावी था। हालांकि उस एक्सीडेंट में मेरी जान जाने का भी खतरा था परंतु इसके चांस बहुत कम थे।

मेरी योजना आंशिक रूप से कामयाब रही। परंतु मेरा मकसद हल नहीं हुआ क्योंकि मेरा पति अश्वनी कुमार मरने की जगह अपाहिज हो गया और मुझे कोई चोट नहीं आई जैसा कि मेरा अनुमान था।

``तुम जानते हो।´´ जब मेरा पति अश्वनी कुमार अस्पताल में जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहा था तो अपने बैडरूम में बुलाकर मैंने अजय से कहा,`` सिर्फ तुम्हें पाने की खातिर मैंने अपने पति को मौत के मुंह में ढकेल दिया है।´´

तब पहली बार अजय के चेहरे पर मुझे वो भाव दिखे जो मैं देखना चाहती थी। वह अपनी जगह से उठ कर मेरे पास आया और उसने मुझे अपनी मजबूत बाहों में भर लिया। उसकी सिर्फ इतनी सी हरकत से मैं दीनदुनिया भूल गई। मेरे शरीर में मेरा खून लावा बनकर दौडने लगा। इससे पहले मेरे जिस्म को मेरे पति ने भी अपनी बाहों में भरा था परंतु तब मेरे अंदर ऐसा भूचाल नहीं आया था। उसके हाथ किसी कुशल संगतराश की तरह मेरे पत्थर रूपी जिस्म पर चल रहे थे और मैं आनंद के अतिरेक से कांप रही थी मेरी बेतावी बढती जा रही थी कि उसने मुझे बंधनमुक्त कर दिया।

``क्या हुआ।´´ मैं विफरती हुई उससे बोली।

``मुझे तुमसे कुछ कहना है।´´ अजय शांत स्वर में मुझसे बोला।

``तुम क्या चाहते हो।´´आखिर मैंने हारकर पूछा।

जब तक तुम्हारा पति जिंदा है तब तक मैं तुम्हारा नहीं हो सकता।´´

``क्यों।´´

``मैं जानता हूं कि तुम्हारा पागलपन सिर्फ तब तक तुम पर सवार है जब तक तुम मुझे हासिल नहीं कर लेती हो। और अगर अभी तुम मुझे हासिल कर लोगी तो हो सकता है कि अपने पति को खत्म करने का तुम्हारा इरादा बदल जाये। मैं चाहता तो तुमसे उस समय भी विवाह कर सकता था जब तुम्हारे पिता ने तुम्हारे साथ विवाह का प्रस्ताव रखा था परंतु उससे मुझे क्या मिलता। सारी जायदाद तो तुम्हारे भाई की होती। मैं बेहद दौलत चाहता हूं जो सिर्फ किसी धनवान विधवा से ही हासिल हो सकती थी लेकिन अभी तुम धनवान हो, विधवा नहीं हो। अगर तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें अपनाऊं तो पहले अपने पति को खत्म करो।´´

मैं धम्म से सोफे पर बैठ गई। वो भी दौलत का दीवाना निकला था। बस उसका अंदाज अलग था। मेरे देखते ही देखते उसने अपनी जेब से एक शीशी निकाली जिसमें कोई पावडर भरा हुआ था।

``इसमें बहुत तेज जहर है।´´ वह बोला,``अस्पताल से तुम्हारा पति घर आ रहा है। किसी तरह इस जहर को उसकी कॉफी में मिला देना। मुझे पाने की तुम्हारी आरजू तुरंत पूरी हो जायेगी।

दूसरे दिन मेरा पति घर आ गया। मैंने पूरी तैयारी कर रखी थी। शाम के समय जब अजय मेरे पति के बैड के पास एक स्टूल पर बैठा था। मैंने जहर एक कॉफी के प्याले में डाला और उसे उसी कमरे में ले आई।

कॉफी का एक-एक प्याला मैंने अजय और अपने पति को दिया और एक प्याला खुद ले लिया। तीनों धीरे धीरे कॉफी पीने लगे। अजय के चेहरे पर एक विशेष चमक थी। वह जानता था कि उसे पाने के लिये मैं कुछ भी कर सकती थी और उसकी समझ में उस समय मेरा पति जहर मिली कॉफी पी रहा था। पांच मिनिट बाद ही अचानक अजय की छाती में तेज जलन होने लगी उसने घबराकर मेरी तरफ देखा तो मुस्कराते हुये मैंने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। वह तुरंत मेरा इशारा समझ गया। उसके चेहरे पर मौत का खौफ नजर आने लगा। मेरे दिल को तब अनोखी राहत मिलने लगी। वह उठा और फोन की तरफ बढ़ने लगा परंतु वहां पहुंचने से पहले ही जमीन पर गिरकर उसके प्राण निकल गये।

मैंने अपने पति की जगह अजय को जहर दे दिया था।




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