वो बचपन के
िदन जब याद आते हैं,ये पल ये लम्हे मासूम से हो
जाते हैं,वो हलकी सी तक्रारें ,वो मीठी सी नोंक-झोंक ,वो रोज नए बहाने बनाना,
वो कल के रूठे
दोस्तो को मनाना,वो स्कूल की घंटी ,वो खेल का मैदान,वो झील के कीनारे आम का बागान,वो पत्थर उचालकर कच्चे आमों को िग़राना,वो दौड़ की होड़ मे दोस्तो को िग़राना -उठाना,वो सावन के झूले ,वो कोयल की कूक,वो
बारीश की िरम्िझम मे भीगना -िभगाना ,वो बारीश के
पानी से आंगन का भर जाना,िफर कागज की कस्तीयां बनाकर पानी मे चलाना !जाने ये अब कहॉ खो गए ,शायद अब ये िकसी ओर के हो गएवो बचपन के िदन जब याद आते हैं,ये पल ये लम्हे मासूम से हो जाते हैं!
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