भ्रातृ-धर्म एक बार घने जंगल से होकर पांडव गुजर रहे
थे। अचानक सभी भाइयों को एक सरोवर दिखाई दिया। उन लोगों को प्यास लगी थी, इसलिए वे पानी पीने के लिए उसमें अपना हाथ बढाने लगे। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव पानी पीने से पहले ही मृत्यु का ग्रास बन गए।
दरअसल, सरोवर के पास खडे एक यक्ष ने उन सभी भाइयों से एक-एक प्रश्न किया था। उन लोगों ने उसके प्रश्न पर कोई ध्यान नहीं दिया और पानी पीने के लिए आगे बढ गए। इसलिए वे यक्ष के कोपभाजन बने और मृत्यु को प्राप्त हुए। कुछ देर बाद युधिष्ठिर भी उस स्थान पर पहुंचे। यक्ष ने उनसे भी प्रश्न किया, युधिष्ठिर ने यक्ष के सारे प्रश्नों के सही-सही उत्तर दे बोले, यक्ष श्रेष्ठ, आप नकुल को जीवन दान दे दें।
यक्ष हंस पडे, बोले-आप अपने सगे भाइयों को छोडकर नकुल का जीवन क्यों चाहते हो?
धर्मराज बोले, यक्ष श्रेष्ठ हम पांचों भाई माताओं के स्नेह-चिह्न हैं।
माता कुंती के पुत्रों में मैं शेष हूं, लेकिन माद्री-मां के दोनों ही पुत्र मर चुके हैं। इसलिए यदि किसी एक के जीवन का प्रश्न है, तो माद्री-मां के पुत्र नकुल का ही पुनर्जीवन उचित है। यक्ष ने सुना, तो भावविह्वल हो बोले, युधिष्ठिर वास्तव में तुम
धर्म के ज्ञाता हो। इसलिए मैं चारों भाइयों को जीवन देता हूं।