माया एक ऐसा शब्द है जिसे बहुत हि भ्रामक अर्थो में लिया गया है और जो कि पश्चिम में भारत की किसी और हि दुनिया का देश होने की
पहचान के लिए उत्तरदायी है। उन्नीसवी शताब्दी में पश्चिम के
बुद्धिजीविओं ने इस शब्द का अर्थ अंग्रेजी के शब्द illusion के अर्थ से तुल्य माना और आज तक हम उस अंग्रेजी अनुवाद को डिगा नही पाये हैं। हद तो तब हो गयी जब अंग्रेजी-शिक्षित भारतीयों ने इस शब्द का
अंतरराष्ट्रीयकरण अंग्रेजी के illusion शब्द के रूप में कर दिया चूंकि यही तो शिक्षा के प्रतिष्ठित केन्द्रों ने किया था। आदर्श रूप में माया ''माया'' हि है परन्तु यदि किसी अनुवादिक शब्द की आवश्यकता हि थी तो फिर ''माध्यमिक सत्य'' से काम चल जाता। माया एक ऐसा शब्द नही है जो संसार के अस्तित्व का निषेध करता हो वरन यह अस्तित्व की सत्यता का विश्लेषण करता है। माया वस्तुतः परमसत्य, जो कि पाराभाषिक सत्य है, कि अपेक्षा आभासिक सत्य के ज्यादा करीब है। हम जिसे संसार की प्रकृति समझते और महसूस करते हैं वह आवश्यक नही कि वही हो। हमारा आभासिक सत्य हमे बताता है कि सूर्य प्रथ्वी का चक्कर लगाता है जबकि पाराभाषिक सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है। हम Einstein भौतिकी के पाराभाषिक सत्य में जीते है जबकि Newton भौतिकी का आभासिक सत्य अभी भी बुद्धि पर हावी रहता है। यह स्वीकार करना कि ठोस वस्तुएं वस्तुतः ऊजा चक्र के कम्पन मातृ हैं, जोकि अतिसूक्ष्म पाराभाषिक सत्य है, और हम तब भी ठोस को ''ठोस'' की तरह हि तेखते एवं महसूस करते हैं।
माया संसार का निषेध नही है वरन यह तो बताती है की संसार जैसा दीखता है वास्तव में नही है। भारत की पौराणिक कथाओं में इसे एक जादुई शक्ति के रूप में प्रुस्तुत किया गया है जहाँ भगवान् विष्णु और शक्ति के देवी ने माया से असुरो का संघार किया। (लेखक के विचार से एस तरह की माया की तुलना कावारिमी - निन्जुत्सू कला से के जा सकती है जिसे भ्रामकता के लिए प्रयोग किया जाता है) अतः दार्शनिक माया और माया जो किसी वर्गविशेष द्वारा समझी और प्रस्तुत की गयी हैका एक तराजू में तौलना बालबुद्धि ही है और इसी वजह से भारत तो सदा ही ऐसा देश माना गया जो संसार को भ्रम मानता है।