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श्वूंग होम>कला और ह्यूमेनिटज़>धार्मिक अध्ययन>हिंदू धर्म में दाह संस्कार के समय एक अनिवार्य प्रथा है कपाल क्रिया।

हिंदू धर्म में दाह संस्कार के समय एक अनिवार्य प्रथा है कपाल क्रिया।

द्वारा: NeerajSood     लेखक : RAJESH NAYAK
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( ॐ त्रियम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं I
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मोक्षिय मामृतात् II )

हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद मृतक का दाह संस्कार किया जाता है अर्थात मृत देह अग्नि को समर्पित की जाती है। दाह संस्कार के समय की जाने वाली एक अनिवार्य प्रथा है कपाल क्रिया। दाह संस्कार के समय कपाल क्रिया क्यों की जाती है? इसका वर्णन गरुड़ पुराण में मिलता है।

गरुड़ पुराण के अनुसार अनुसार जब शवदाह के समय मृतक के सिर पर घी की आहुति दी जाती है। इसी क्रिया को कपाल क्रिया कहते हैं। इस क्रिया के पीछे अलग...-अलग मान्यताए हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार कपाल क्रिया के बाद ही मृत व्यक्ति के प्राण शरीर से पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं और नए जन्म की क्रिया आगे बढ़ती है।

एक अन्य मान्यता है कि सिर पर घी डालकर इसलिए जलाया जाता है ताकि वह अधजला न रह जाए अन्यथा अगले जन्म में वह अविकसित रह जाता है। हमारे शरीर के प्रत्येक अंग में विभिन्न देवताओं का वास होने की मान्यता का विवरण श्राद्ध चंद्रिका में मिलता है। चूंकि सिर में ब्रह्मा का वास माना गया है इसलिए शरीर को पूर्ण रूप से मुक्ति प्रदान करने के लिए कपाल की जाती है।

वहीं इस क्रिया के पीछे यह भी एक कारण है कि सिर की हड्डी काफी मजबूत होती है और वह आसानी से जलती नहीं है। सिर को अग्नि में भस्म होने में भी समय लगता है। अत: दाह संस्कार के समय घी डालने से वह आसानी से जल जाती है।
( ( ॐ त्रियम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं I
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मोक्षिय मामृतात् II )
( ( ॐ त्रियम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं I
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मोक्षिय मामृतात् II )
( ( ॐ त्रियम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं I
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मोक्षिय मामृतात् II )
प्रकाशन तिथि: 31 दिसम्बर, 2011   
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