ईद मीलादुन्नबी का उत्सव -4
(ऐतिहासिक एंव धार्मिक दृश्य )
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
मैं अति मेहरबान
और दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ।
(भाग-4)
जब उपरोक्त किसी चीज़ का प्रमाण नहीं है तो ज्ञात हुआ कि यह अल्लाह तआला के धर्म में से नहीं है, और जब वह अल्लाह तआला के धर्म में से नहीं है तो हमारे लिए जाईज़ -वैध- नहीं है कि हम इस के द्वारा अल्लाह तआला की उपासना करें तथा इस के द्वारा अल्लाह तआला की निकटता प्राप्त करें। जब अल्लाह तआला ने हमारे लिए अपनी निकटता प्राप्त करने के लिए एक निश्चित मार्ग एंव पथ निर्धारित कर दिया है और वह मार्ग वही है जिसे पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दर्शाया और दिखाया है, तो फिर हमारे लिए -जबकि हम उसके दास और बन्दे हैं- यह कैसे वैध हो सकता है कि उस की निकटता प्राप्त करने के लिए अपनी ओर से कोई मार्ग और पथ अविष्कार करें? यह अल्लाह तआला के प्रति एक अपराध है कि हम उस के धर्म में किसी ऐसी चीज़ को वैध घोषित कर लें जिस का इस धर्म से कोई संबंध और लगाव नहीं। तथा इस से अल्लाह तआला के निम्नलिखित कथन को झुठलाना निष्कर्षित होता है:
``आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को सम्पूर्ण कर दिया और तुम पर अपनी नेमत -अनुकम्पा और उपकार- भर पूर कर दी।´´ (सूरतुल माईदा:3)
अत: हम कहते हैं कि यह जश्न मीलाद यदि धर्म के पूर्णता में से है तो इसका पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु से पहले मौजूद होना अनिवार्य है, और यदि वह धर्म के पूर्णता में से नहीं है तो उस का धर्म से होना सम्भव नहीं, इस लिए कि अल्लाह तआला का क्थन है कि:
``आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को सम्पूर्ण कर दिया।´´
और जो व्यक्ति यह गुमान करे कि वह कमाले दीन -धर्म के पूर्णता- में से है, हालांकि उस का वजूद पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद हुआ है, तो उस का यह कहना इस आयत को झुठलाता है।
इस में कोई सन्देह नहीं कि वह लोग जो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का जश्न मनाते हैं उनका उद्देश्य पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान, आप की महब्बत का प्रदर्शन और लोगों के भीतर इस जश्न में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्रति मनोभाव को उभारना है। और यह समस्त चीज़ें इबादात -उपासना- में से हैं( पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रेम इबादत -उपासना- है, बल्कि आदमी का ईमान उस समय तक परिपूर्ण नहीं हो सकता जब तक कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उस के निकट उसके प्राण, उसकी संतान, उसके माता पिता और दुनिया के समस्त लोगों से अधिक प्रिय न हो जायें, तथा पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान करना इबादत है, इसी प्रकार पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्रति भावना को उभारना धर्म में से है (क्योंकि इस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत की ओर रूजहान (अभिरूचि) पाया जाता है। अत: अल्लाह तआला की निकटता प्राप्त करने के लिए और उस के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सम्मान के लिए पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का जश्न मनाना इबादत हुआ, और जब यह इबादत है तो कभी भी यह जाइज़ -वैध- नहीं है कि अल्लाह तआला के धर्म में ऐसी चीज़ ईजाद की जाए जो उस का भाग नहीं है। इसलिए जश्न मीलाद मनाना बिद्अत और हराम -निषिध- है।
इस के अतिरिक्त हम सुनते हैं कि इस जश्न में ऐसे मुनकरात -अवैध काम- पाए जाते हैं जिन्हें न शरीअत वैध ठहराती है और न ही हिस्स और बुद्धि। इस में लोग ऐसे क़सीदे -नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रशंसा में कविताएं- गाते हैं जिन में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में ग़ुलु -अतिश्योक्ति- पाया जाता है, यहाँ तक कि वह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अल्लाह तआला से बड़ा ठहरा देते हैं। अल्लाह की पनाह!
उन्हीं मुनकरात में से यह भी है जो हम कुछ जश्न मनाने वालों की मूर्खता और बुद्धिहीनता के बारे में सुनते हैं कि जब जन्म कथा पढ़ने वाला आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म के वर्णन पर पहुँचता है तो समस्त उपस्थित लोग एक साथ खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की रूह उपस्थित हो गई( इस लिए हम उसके सम्मान में खड़े होते हैं। यह अत्यन्त मूर्खता और बुद्धिहीनता है। तथा अदब और सभ्यता यह नहीं है कि वह खड़े हो जायें। इसलिए कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने लिए खड़े होने को पसन्द नहीं करते थे। तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम, -जबकि वह लोगों मे सब से अधिक आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से महब्बत करने वाले और हम से कहीं अधिक पैग़म्बर का सम्मान करने वाले थे-, आप के जीवन में आप के लिए खड़े नहीं होते थे( क्योंकि वह जानते थे कि आप इस चीज़ को नापसन्द करते हैं, तो फिर इन काल्पनिक चीज़ों का क्या ऐतिबार।
यह बिद्अत -जश्न मीलाद की बिद्अत- तीनों प्रतिष्ठित सदियों के पश्चात अस्तित्व में आई है, और इस के अन्दर ऐसे मुन्करात किए जाते हैं जिन से असल धर्म में ख़लल (बिगाड़) आता है। इस के अतिरिक्त इस के अन्दर पुरूष एंव स्त्री का इख़तिलात (मिश्रण) और अन्य बुराईयां होती हैं। (फतावा अरकानुल-इस्लाम, लेखक: मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह पृष्ठ सं. 172-174)