ईद मीलादुन्नबी का उत्सव -3
(ऐतिहासिक एंव धार्मिक दृश्य )
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
मैं अति मेहरबान और दयालु
अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ।
(भाग-3)
प्रश्न यह है कि क्या कोई बुद्धिमान और अपने धर्म से आस्था रखने वाला मुसलमान इन उबैदियों -फातिमियों- की घढ़ी हुई इस घृणित बिद्अत को मनाना पसन्द करेगा!!!
इसी पर बस नहीं, बल्कि उस समय काल के सामाजिक स्थिति पर दृष्टि करने से ज्ञात होता है कि उबैदियों की राजनीति केवल एक उद्देश्य को प्राप्त करने पर आकर्षित थी और वह था पूरे संघर्ष और नि:स्वार्थता के साथ लोगों को अपने धर्म को स्वीकार करने पर तत्पर करना और उसे मिस्र तथा आस पास के अपने प्रशासन छेत्रों में सामान्य धर्म बनाना। इसके चलते उबैदी शासक यहूदियों और ईसाईयों के साथ अत्यन्त सहानुभूति और रिआयत का व्यवहार करते थे, उन्हें बड़े-बड़े पदों और मन्त्रालयों पर नियुक्त करते थे। दूसरी ओर अहले-सुन्नत के साथ उनका व्यवहार उसके विपरीत था, तीनों ख़ुलफा (अबु बक्र, उमर, उसमान रज़ियल्लाहु अन्हुम) और इनके अतिरिक्त अन्य सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम और सामान्य सुिन्नयों को मिंबर व मेहराब से लानत किया जाता था। 372 हिज्री में पूरे मिस्र देश में तरावीह की नमाज़ बन्द कर दी गई। 395 हिज्री में मिस्र के भीतर समस्त मिस्जदों, इमारतों, भवनों, कि़ब्रस्तानों और दुकानों पर पूर्वजों के धिक्कार और लानत पर सम्मिलित बातें लिखवाई गईं और उन्हें रंगों से रंगा गया। इन सभी चीज़ों से बढ़ कर यह कि उबैदी शासक -मनसूर बिन नज़ार- ने उलूहियत -ईश्वर होने- का दावा किया और लोगों को आदेश दिया कि जब खतीब मिंबर पर उस का नाम ले तो उसके सम्मान में सब पंक्ति बनाकर खड़े हो जायें, चुनांचे उसके समस्त देशों में ऐसा ही किया गया, यहाँ तक कि हरमैन शरीफैन में भी। मिस्र वालों को विशेष रूप से यह आदेश था कि जब उसका नाम आए तो वह सज्दे में गिर जाया करें।
क्या फिर भी एक गैरतमन्द मुसलमान इन इस्लाम के शत्रुओं के अविष्कारित घिनावनी बिद्अत को मनाने को पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से महब्बत, श्रद्धा और सम्मान का नाम दे गा?!!!
इस्लामी भाईयो! यह है इस मीलाद की ऐतिहासिक पृष्ठि भूमि -जिसे आज बहुत सारे मुसलमान बड़े ही हर्ष व उल्लास के साथ मनाते हैं- जिस की ओट में उबैदियों ने अपने बातिनी धर्म का प्रचार एंव प्रसार किया तथा सुन्नत और अहले सुन्न्त का सर्वनाश किया।
इसी लिए उलमाये-सुन्नत ने जब से यह बिद्अत ईजाद हुई है, इस का खण्डन करते आए हैं। और हर युग में इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जात रहा है( ताकि जो लोग इस बिद्अत में लिप्त हैं उन्हें सावधान किया जाए और इस से संबंधित उठाए जाने वाले प्रश्नों और सन्देहों का निराकरण किया जाए।
क़ुर्आन एंव हदीस का साधारण ज्ञान रखने वाला मुसलमान भी यदि न्याय एंव बुद्धि से काम ले तो इस मस्अले की वास्तविकता जानने में उसे कठिनाई नहीं होगी, किन्तु बुरा हो तअस्सुब और हठ का जो आदमी को अन्धा बना देती हैं। बहर हाल सामान्य मुसलमानों की शुभ चिन्ता और ख़ैरखाही के कर्तव्य के आधार पर इस से संबंधित एक फत्वा प्रस्तुत किया जा रहा है।
सउदी अरब के एक महा धर्म-शास्त्री एंव भाष्य कार अल्लामा मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया कि: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का उत्सव मनाना कैसा है? तो उन्हों ने उत्तर दिया:
प्रथम: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म की रात निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है, बल्कि वर्तमान युग के कुछ ज्ञानियों की तह्क़ीक यह है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म दिवस -निश्चित रूप से- रबीउल-अव्वल की नवीं रात है, इसकी बारहवीं रात नहीं है। इस आधार पर रबीउल-अव्वल की बारहवीं तारीख को पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का जश्न मनाना ऐतिहासिक रूप से निराधार और वस्तुस्थिति के विरूद्ध है।
द्वितीय: शरई -धार्मिक- दृष्टि कोण से भी जश्न मीलाद मनाना अनाधार और अवैध है। क्योंकि यदि वह अल्लाह की शरीअत -धर्म-शास्त्र- में से होता तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उसे अवश्य मनाते, या उम्मत को इसकी सूचना देते। और यदि आप ने इसे मनाया होता या उम्मत को इस की सूचना दी होती तो इस का उल्लेख सुरक्षित रूप से पाया जाना अनिवार्य था। इसलिए कि अल्लाह तआला का फर्मान है:
``हम ने ही इस ज़िक्र -क़ुरआन- को उतारा है और हम ही इस की सुरक्षा करने वाल हैं।´´ (सूरतुल-हिज्र:9)