गुरु भक्ति महाराष्ट्र के सतारागढपर छत्रपति शिवाजी
का शासन था। एक बार उनके दरवाजे पर एक भिक्षुक संत आए। शिवाजी बाहर आए, तो सामने
समर्थ गुरु रामदास को पाया। समर्थ गुरु उस समय के प्रसिद्ध संत थे और भिक्षाटन करके अपना भरण पोषण करते थे। वे जिसके दरवाजे पर भिक्षा मांगने चले जाते, उसका
सोया हुआ भाग्य जाग जाता।
असामान्य गुरु और असामान्य शिष्य एक-दूसरे के आमने-सामने हों तो फिर भिक्षा भी असामान्य ही होनी चाहिए। शिवाजी ने एक कागज पर कुछ लिखा और सोने के थाल में रखकर गुरु को भेंट कर दिया। समर्थ गुरु ने जब कागज पढा, तो आश्चर्य चकित रह गए। दरअसल, भिक्षा में उनके शिष्य ने अपनी सारी चल-अचल संपत्ति और राजपाट सहित सभी राज्याधिकार अपने गुरु को भेंट कर दिया था।
समर्थ गुरु बोले-शिवा, मैं राजपाट का क्या करूंगा? मुझे मात्र दो मुट्ठी अन्न चाहिए।
शिवाजी बोले - मैं दान में दी हुई वस्तु वापस नहीं ले सकता गुरुदेव।
कुछ देर खामोश रहने के बाद समर्थ गुरु बोले - ठीक है मत लो, लेकिन मेरे प्रतिनिधि के रूप में राज्य-व्यवस्था संभालो। छत्रपति शिवाजी ने गुरु आज्ञा स्वीकार कर उनकी चरण-पादुकाएं सिंहासन पर रख दी। अपने गढ पर भगवा झंडा फहराया और गुरु के नाम पर शासन करना शुरू कर दिया।