ईद मीलादुन्नबी का उत्सव -2
(ऐतिहासिक एंव धार्मिक दृश्य )
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
मैं अति मेहरबान
और दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ।
(भाग-2)
सब से पहले जिस ने यह बिद्अत ईजाद की वह `बनू उबैद अल-क़द्दाह´ हैं, जो अपने आप को फातिमी कहते थे और अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु के संतान की ओर इन्तिसाब करते थे। वास्तव में वह `बातिनी धर्म´ के संस्थापकों में से हैं, उनका दादा `इब्ने दीसान´ -जो `अल-क़द्दाह´ के लक़ब से प्रसिद्ध, जाफर बिन मुहम्मद अस-सादिक़ का आज़ाद किया हुआ ग़ुलाम और `अहवाज़´ का बासी था- ईराक़ में बातिनी धर्म के संस्थापकों में से था। फिर वह मराकश चला गया और वहाँ उस ने अक़ील बिन अबी तालिब की ओर अपने को मन्सूब किया और यह गुमान किया कि वह उनके वंश से है। जब उसके साथ कट्टर राफिज़ियों -शीयों- का एक समूह सम्मिलित हो गया तो उस ने यह दावा किया कि वह मुहम्मद बिन इस्माईल बिन जाफर अस-सादिक़ के वंश से है। उन्हों ने उसके इस दावा को स्वीकार कर लिया, हालांकि वास्तविकता यह है कि मुहम्मद बिन इस्माईल बिन जाफर अस-सादिक़ ने अपनी कोई संतान नहीं छोड़ी थी। उसके मानने वालों में से हमदान बिन क़रमत भी था जिसकी ओर कुख्यात क़रामतह की निस्बत है। फिर एक समय के पश्चात उन में सईद बिन अल-हुसैन बिन अहमद बिन अब्दुल्लाह बिन मैमून बिन दीसान अल-क़द्दाह के नाम से प्रसिद्ध व्यक्ति प्रकट हुआ और उसने अपना नाम व नसब बदल दिया और अपने मानने वालों से कहा कि मैं उबैदुल्लाह बिन अल-हसन बिन मुहम्मद बिन इस्माईल बिन जाफर अस-सादिक़ हूँ। इस प्रकार मराकश में उसके फित्ने का उदय हुआ।
किन्तु इल्मे अन्साब (वंशावली शास्त्र)के माहिर अन्वेषकों ने इस के इस नसब के दावा का खण्डन किया। चुनांचे रबीउल-आख़िर 402 हिज्री में फुक़हा, मुहद्देसीन, क़ाज़ियों और सदाचारियों की एक जमाअत ने महज़रनामें (हस्ताक्षरित पत्र) तैयार किए जो फातिमियों -उबैदियों- के नसब के खंडन पर आधारित थे और सब ने यह गवाही दी कि मिस्र का शासक: मन्सूर बिन नज़ार बिन मअद बिन इस्माईल बिन अब्दुल्लाह बिन सईद जब मराकश के देश में पहुँचा तो वहाँ उस ने अपना नाम उबैदुल्लाह और लक़ब महदी रख लिया, उसके पूर्वज ख़वारिज थे, अली बिन अबी तालिब की औलाद में उनका कोई नसब नहीं है, और जो कुछ इन्हों ने दावा किया है वह बातिल और झूठ है, बल्कि अली बिन अबी तालिब के घराने के किसी व्यक्ति के बारे में हमें यह ज्ञान नहीं कि उस ने इन लोगों को खवारिज घोषित करने में संकोच किया हो। मिस्र का शासक और उसके पूर्वज कुफ्फार (नास्तिक), फुस्साक़ (पापी), फुज्जार (दुराचारी), मुलहिद (अधर्मी ) और ज़िन्दीक़ (धर्म भ्रष्ठ) हैं, इस्लाम के इनकारी और मजूसियत (अग्नि पूजा) और सनवियत के श्रद्धालू हैं। इन्हों ने हुदूद (धार्मिक दंड) को मुअत्तल (निलंबित)कर दिया, शरमगाहों को वैध कर दिया, शराब को हलाह कर दिया है और रक्तपात का बाज़ार गर्म कर रखा है। अंबिया -ईश्दूतों- को गाली देते हैं, पूर्वजों पर धिक्कार करते हैं और प्रमेश्वरता का दावा करते हैं। इस महज़र (घोषणा पत्र) पर हनफी, मालिकी, शाफई, हंबली, अहले हदीस, अहले कलाम, अनसाब के माहिर अन्वेषकों, अलवियों और साधारण लोगों के हस्ताक्षर उपस्थित हैं, जो सब के सब उनके नसब का खण्डन करते हैं और उन्हें मजूस (अग्नि पूजक) या यहूद की औलाद में से घोषित करते हैं, उदाहरणत: इन हस्ताक्षर कर्ताओं में: अल-मुर्तज़ा, अर-रज़ी, अबुल क़ासिम अल-जज़री, अबू हामिद अल-असफराईनी, अबुल हसन क़ुदूरी, अबु अब्दुल्लाह बैज़ावी, अबु अब्दुल्लाह सैमरी और अबुल क़ासिम तनूखी हैं। कुछ उलमा ने इनके खण्डन में पुस्तकें लिखी हैं और इस बात से पर्दा उठाया है कि इनका धर्म प्रत्यक्ष रूप से रफ्ज़ और तशय्यु था और प्रोक्ष रूप से मात्र कुफ्र था। (अल बिदाया वन निहाया, इब्ने कसीर 5/537-540)
फातिमियों -उबैदियों- का प्रवेश मिस्र में 5 रमज़ान 362 हिज्री में हुआ, और यही उन के शासन काल का आरम्भ है। चुनांचे साधारणत: जन्म दिवस (बर्थ डे, बरसी ) मनाने और विशेषकर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का जश्न मनाने की बिद्अत उबैदियों के काल में प्रकट हुई और इन्हीं लोगों ने पहली बार मुसलमानों के लिए अवैध -बिदई- जश्नों और उत्सवों का द्वार खोला, यहाँ तक कि ये लोग पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म दिवस, अली बिन अबी तालिब का जन्म दिवस, हसन का जन्म दिवस, हुसैन का जन्म दिवस और फातिमा ज़हरा का जन्म दिवस मनाने के साथ साथ, मजूसियों और ईसाईयों के त्योहारों को भी बड़े हर्ष व उल्लास से मनाते थे, उदाहरणत: नौ रोज़, गतास, मीलादे मसीह (क्रिस मस् ) और अदस आदि। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वह इस्लाम से कितना दूर और इस के विरोधी थे। तथा यह इस बात का भी तर्क है कि वह उपरोक्त उत्सवों का संगठन पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आप के वंश से महब्बत के कारण नही करते थे, बल्कि इन उत्सवों का अविष्कार करके इनके पीछे उनका उद्देश्य अपने बातिनी धर्म और असत्य विचारधारा को लोगों के बीच फैलाना और प्रचार करना तथा उन्हें सत्य धर्म और शुद्ध आस्था से विमुख करना था।