गुरू - फ़िल्म
Summary rating: 2 stars
2 समीक्षा
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299
शब्द:
600
प्रकाशन तिथि: मई 10, 2007
गुरू - द फ़िल्म, साफ़ जाहिर है कि मणीरत्नम को प्रेरणा केवल स्वर्गीय धीरू भाई अम्बानी "रिलाइन्स इन्ड्स्ट्री" के सस्थापक से थी। परन्तु यह केवल प्रेरणा ही थी और कुछ नही। बाकी सब कुछ काम प्रमुखस है कारीगर और मै कहुगा दुर्लभ निर्देशक ,मि मणीरत्नम।
आजकल ऐसै दुर्लभ निर्देशक ढूढ पाना काफी मुशकिल है। मिथुन चक्रवर्ती का इसमे पुरे समय तक कि्रदार है। तमिल के एक कथन है कि मा (शेरनी ) जब आठ फ़ीट उछ्लती है तो बेटा सो्लह फ़ीट उछ्लेगा। ऐसा प्रतीत होता है, अभिषेक बच्चन को देख कर। लगता है वह अपने पिता को पीछे छोड देगा । लेकिन मे सोचता हु कि असली सम्मान मणीरत्नम के निर्देशन को देना चाहीये।
एक रूपन्तरण- एक जवान और अनुभवी परन्तु एक अलग कद-काठी का जो कि बडे सहसिक और आपति वाले व्वसायिक जीवन के लिये एक साधारण काम का तिरस्कार कर देता है। एक शक्ति शाली और नई दिशा वाले व्वयसायी और उधोगी होने मे उसकी मध्य आयु पुरी होती है। अन्त मे आप एक जवान आदमी नही देखते है, न ही सडको पर फूल छितराये जाते है। भावो के विपरीत आयोग के सामने एक प्रमुख वक्ता रूप मे वह अनेक वस्तुए खो देता है लेकिन वह अपना साहस कभी नही खोता है जब एश्वर्या राय इस भारी भरकम भावो को बन्द करेगी जिसे वह नाच-गा कर कहती है? वास्तव मे उसे एक मह्त्वपुर्ण कि्रदार सेकेण्ड हाफ़ को देखकर मुख्य नायक के किरदार को ज्यो का त्यो रखकर, दिया है। माधवन का एक छोटा पर तुलना वाला रोल है।
कुल मिलाकर सभी मुख्य पात्र आपस मे मिलकर एक ऊचे दर्जे व अच्छे गुणो वाला ड्रामा बनाते है। मुख्य बात ये है कि मणीरत्नम हमे २०वी शताब्दी के शुरू व अन्त मे ले जाते है। बेकग्राउन्ड मे ए आर रहमान प्रदर्शीत करते है कि वह फ़िल्म जगत मे सर्व श्रेष्ठ है। हम कह सकते कि फ़िल्म निर्माण कि लागत भारत से हालिवुड कि ओर जा रही है।