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पर्दे का अमिताभ बनाम सचमुच का अमिताभ

Summary by : ginius
विजिट्स: 4
शब्द: 900
प्रकाशन तिथि: अप्रैल 07, 2008
सत्तर के दशक के मध्य में एक सब-इंस्पेक्टर था.
बेहद कर्मठ और अपने उसूलों से समझौता न करने वाला. अपना कर्तव्य उसके लिए इतना अहम था कि उसे पूरा करने के लिए वह अपने अफ़सरों से भी टकराने में नहीं हिचकता और आख़िरकार पुलिस की नौकरी तक छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है.
उस सब-इंस्पेक्टर को जो दोस्त मिलता है वह भी ग़ज़ब का. उसके लिए यारी, ईमान की तरह होती है.
दो दशक में यह सब-इंस्पेक्टर प्रमोशन पाकर ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (जेसीपी) हो गया. उसका ओहदा बढ़ गया. जीवन शैली बदल गई. लेकिन विडंबना देखिए कि इसके साथ उसका चरित्र भी बदल गया. है तो वह अब भी कर्मठ लेकिन वह अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं होता. समझौता करते हुए नौकरी करता रहता है. यहाँ तक कि उसका अफ़सर भी उसके सामने ग़ैरक़ानूनी काम करता है और वह मन मसोसकर कर रह जाता है.
कालांतर में जो उसका मित्र है वह भी यारी को ईमान नहीं मानता. उसके लिए ईमान उसके राजनीतिक आका हो जाते हैं.
अब सब-इंस्पेक्टर के रुप में अमिताभ बच्चन को रखकर देखिए जो ‘जंज़ीर’ में सब-इंस्पेक्टर था और ‘देव’ में जेसीपी हो गया था. एक पत्रकार मित्र ने जब यह तुलना सामने रखी थी तो रोंगटे खड़े हो गए थे.
इन दो चरित्रों को अगर समाज की सच्चाई से जोड़कर देखें तो यह तुलना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं लगती. समाज की एक सच्चाई की तरह लगती है. राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण, दोनों की एक ख़ौफ़नाक सच्चाई सामने खड़ी हुई दिखती है.
समाज का आईना?
हालांकि वह एक अभिनेता के लिए पर्दे पर निभाने के लिए रचे गए दो चरित्र थे. लेकिन यह हमारे अपने सच की तरह लगता है. वह अमिताभ बच्चन जिसे भारतीय दर्शकों ने ‘एंग्री यंगमैन’ के रुप में सर आँखों पर बिठाया वही अमिताभ कालांतर में जब एक ऐसे चरित्र के रुप में सामने आया जो समझौतावादी हो गया था, तो दर्शकों को ज़रा भी बुरा नहीं लगा.








ज़जीर अमिताभ की वह फ़िल्म थी जिसने उन्हें स्टार बना दिया
जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के बीच जब समाज में किसी भी ग़लत के प्रति एक तरह की नाराज़गी का माहौल था तब व्यवस्था से टकराता, ग़ुस्से से भरा अमिताभ लोगों को भा रहा था. लेकिन नरेंद्र मोदी के समय में जब अमिताभ व्यवस्था के आगे लाचार खड़ा दिखता है तो लोगों को बहुत अखरता नहीं है.
अगर सिनेमा सचमुच समाज का आईना है तो यह समाज में आए परिवर्तन की कथा भर है. इसे किसी अभिनेता के निजी जीवन में आए परिवर्तन से जोड़कर देखना शायद ठीक नहीं है.
लेकिन अमिताभ जैसे अभिनेता के लिए, भारतीय समाज में यह दो अलग-अलग तस्वीरों की तरह नहीं दिखतीं. दोनों एक दूसरे में इतनी गड्डमड्ड हो गई हैं कि अभिनेता और व्यक्ति अमिताभ एक से ही दिखते हैं. जब अभिनेता अमिताभ कुछ कर गुज़रता है तो लोगों को वास्तविक जीवन का अमिताभ याद रहता है और जब असल का अमिताभ कुछ करता है तो पर्दे का उसका चरित्र सामने दिखता है.
अमिताभ का चरित्र बाज़ार के साथ जिस तरह बदला है वह भी अपने आपमें एक चौंकाने वाला परिवर्तन है. जब ‘दीवार’ के एक बच्चे ने कहा कि उसे फेंककर दिए हुए पैसे मंज़ूर नहीं तो लोगों ने ख़ूब तालियाँ बजाईं. बहुत से लोगों को लगा कि यही तो आत्मसम्मान के साथ जीना है.
उसी अमिताभ को बाज़ार ने किस तरह बदला कि वह अभिनेता जिसके क़द के सामने कभी बड़ा पर्दा छोटा दिखता था, उसने छोटे पर्दे पर आना स्वीकार कर लिया. फिर उसी अमिताभ ने लोगों के सामने पैसे फ़ेंक-फेंककर कहा, ‘लो, करोड़पति हो जाओ.’ कुछ लोगों को यह अमिताभ अखर रहा था लेकिन बहुसंख्य लोगों को बाज़ार का खड़ा किया हुआ यह अमिताभ भी भा गया.
लोग तो पता नहीं कितने करोड़पति हुए लेकिन अमिताभ ख़ुद करोड़ों कमाकर अपने आपको दीवालिया होने से बचा ले गए.
दो छवियाँ








राजनीति से दूर रहने का दावा करने वाले अमिताभ चुनावी पोस्टरों में दिखे
ऐसा नहीं है कि बाज़ार ने उन्हें दीवालिया बनाया था. दरअसल वह अमिताभ का अपने बारे में किए हुए एक ग़लत आकलन का प्रतिफल था. जब लोग अमिताभ को पर्दे पर हाथों हाथ ले रहे थे तभी उन्हें यह भ्रम हो गया था कि वास्तविक जीवन में भी वह वैसा ही करिश्मा दिखा सकते हैं.
अगर लोगों ने (या ख़ुद अमिताभ ने!) पर्दे के अमिताभ और वास्तविक जीवन के अमिताभ में घालमेल नहीं किया होता तो शायद उन्हें बहुत कुछ नहीं अखरता-गड़ता. न उन्हें ‘नि:शब्द’ के बूढ़े का अपनी बेटी की उम्र की लड़की से इश्क लड़ाने पर आपत्ति होती और न ‘चीनी कम’ में अपने से आधी उम्र की एक लड़की से शादी करने की ज़िद पर आश्चर्य होता.
तब न लोगों को उनके राजनीतिक दोस्ती-दुश्मनी पर आपत्ति होती और न यूपी के दमदार या बेदम होने पर.
 
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