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एक मुलाक़ात अभिनेता ओम पुरी के साथ

Summary by : ginius
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शब्द: 900
प्रकाशन तिथि: अप्रैल 07, 2008
. इस बार एक मुलाक़ात में हमारे साथ ऐसी शख़्सियत हैं जो टैलेंट और स्टारडम का ख़ूबसूरत मिश्रण हैं. जी हाँ इस बार हमारे मेहमान हैं सुपर एक्टर ओम पुरी. जब अपनी तारीफ सुनते हैं तो कैसा लगता है, कहीं ऐसा तो नहीं लगता कि अब तो लोगों को कहना ही चाहिए कि मैं ज़बर्दस्त अभिनेता हूँ? नहीं ऐसा नहीं है, अपनी तारीफ सुनकर अच्छा लगता है. ये स्वाभाविक है. किसी की तारीफ हो और वो स्वीकार न करे तो ये बदतमीज़ी होगी. इस प्रशंसा का हक़दार बनने के लिए ओमपुरी ने कितनी मेहनत की? मेहनत तो बहुत की है. तीन साल नेशनल स्कूल ड्रामा (एनएसडी) में रहा. एक साल दिल्ली में फ्रीलासिंग की. इसके बाद दो साल फ़िल्म इंस्टीट्यूट में रहा. 1976 में मुंबई गया और 1981 में पहली फ़िल्म आक्रोश मुझे मिली. आप खुद ही देख लीजिए कि कितने साल की मेहनत है. हालाँकि मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है. दरअसल, जब हम बॉम्बे गए थे तो एनएसडी की कोई पहचान नहीं थी, लेकिन आज मेरे ख़्याल से कोई 150 एक्टर होंगे जो एनएसडी से हैं और उन्होंने बहुत जल्द फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई है. दोनों ने एनएसडी में एक साथ अभिनय सीखा है एनएसडी और पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट की बात चली तो पूछ लूँ कि क्या दोनो संस्थानों के छात्रों के बीच क्या किसी तरह की प्रतिस्पर्धा थी? नहीं, सीधे तौर पर तो किसी तरह की प्रतिस्पर्धा नहीं थी. क्योंकि दोनो की अपनी अलग पहचान थी और है. हालाँकि बाद में एनएसडी फ़िल्म के साथ मिल गया और इसकी वजह ये है कि मराठी, बंगाली थियेटरों की तरह हिंदी थियेटर प्रोफ़ेशनल नहीं हो सका. ऐसा क्यों है, जबकि हिंदी में एक से कवि, लेखक, साहित्यकार, कलाकार हुए हैं? ठीक है, लेकिन थिएटर की परंपरा नहीं रही. मसलन पंजाब में भांड, मरासी. लेकिन हिंदी या पंजाबी में थिएटर नहीं रहा. बीबीसी एक मुलाक़ात के सफ़र आगे बढ़ाएँ, आपके पसंदीदा गाने? किशोर कुमार का गाया गाना ‘आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ इक ऐसे गगन के तले’. इसके अलावा मणिरत्नम की फ़िल्म का गाना ‘छोटी सी आशा...’. साथ ही ‘हम दोनों’ फ़िल्म का गाना ‘हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया’, शहीद का गाना ‘जोगी हम तो लुट गए तेरे प्यार में’ भी मुझे काफी पसंद है. अच्छा, पहली बार दिमाग में कब और कैसे आया कि एक्टर बनना है? जब मैं स्कूल में था तो फौज में भर्ती होना चाहता था, हालाँकि स्कूल में मैने दो छोटे-छोटे नाटक किए थे. लेकिन कॉलेज पहुंचकर मैं गंभीर हो गया. वहाँ जो नाटक किए, उनमें मुझे काफी प्रशंसा मिली. जब मैं यूनीवर्सिटी के यूथ फ़ेस्टिवल में हिस्सा ले रहा था वहाँ निर्णायक हरपाल टिवाना और उनकी पत्नी बीना थी. तो उन्होंने मुझे अपने थिएटर पंजाब कला मंच में काम करने का प्रस्ताव दिया. मैं उस समय दिन में कॉलेज में लैब असिस्टेंट की नौकरी करता था और इवनिंग कॉलेज में पढ़ता था. हम शनिवार, रविवार को देश के विभिन्न स्थानों पर नाटक के लिए जाते थे. मैं इस ग्रुप के साथ ढाई साल रहा. फिर मुझे एनएसडी के बारे में पता चला. मैने आवेदन किया और मेरा चयन भी हो गया. इसके बाद आक्रोश और अर्धसत्य. दोनो बहुत शानदार फ़िल्में थी. उस समय एंग्री यंगमैन का दौर भी शुरू हो चुका था. आपका चेहरा भी बहुत आकर्षक नहीं था, कैसे हुआ ये सब? देखिए ऐसा तो शुरू में बच्चन साहब के बारे में भी कहा जाता था कि उनका चेहरा चॉकलेटी नहीं है.  जब हम बॉम्बे गए थे तो एनएसडी की कोई पहचान नहीं थी, लेकिन आज मेरे ख़्याल से कोई 150 एक्टर होंगे जो एनएसडी से हैं और उन्होंने बहुत जल्द फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई है   ओम पुरी, अभिनेता लेकिन माफ़ कीजिएगा. उनके मुक़ाबले आपका चेहरा तो बहुत कम चॉकलेटी है? बिल्कुल. ये सही बात है. ऐसा बहुत लोगों के बारे में कहा गया. शेख मुख्तार के चेहरे पर भी चेचक के दाग थे और वो ‘बी’ ग्रेड फ़िल्मों में हीरो होते थे. बाद में वो पाकिस्तान चले गए. उस समय आपका रोल मॉडल कौन था? बचपन में हम दिलीप कुमार, बलराज साहनी, मोतीलाल, वहीदा रहमान के भक्त थे. ऐसा नहीं कि बाद में हम उनसे प्रभावित नहीं रहे, लेकिन एनएसडी में हमने ये सीखा कि फ़िल्म इंडस्ट्री में हमें ख़ुद अपनी जगह बनानी है और किसी की नकल नहीं करनी है. अर्धसत्य, आक्रोश में आपकी पसंदीदा फ़िल्म कौन थी? बहुत मुश्किल है. अर्धसत्य मैं इसलिए चुनुँगा कि वो ज़्यादा लोगों तक पहुँची. अर्धसत्य सिर्फ़ मध्यम, उच्च मध्यम वर्ग तक ही नहीं पहुंची बल्कि कामकाजी वर्ग तक भी पहुँची. इस फ़िल्म ने ये भी भ्रम तोड़ा कि कामकाजी तबका सिर्फ़ गाने-बजाने की फ़िल्मों को पसंद करता है. कई लोगों का कहना है कि आर्ट और पेशेवर दोनो तरह की फ़िल्मों में आप कैसे फ़िट हो जाते हैं? मैं कहूँगा कि ये सब एनएसडी की देन है. वहाँ हमें सघन प्रशिक्षण मिला. दरअसल, जब मैंने आक्रोश की तो मुझे लगा कि मेरी छवि ‘गंभीर’ कलाकार की बन गई है. तंगहाली के बावजूद मैने इस छवि को तोड़ने के लिए एक नाटक ‘बिच्छू’ किया. हमने इसके 70-75 शो किए और यह काफ़ी सफल रहा. इससे लोगों को लगा कि मैं गंभीर ही नही हास्य भूमिकाएं भी कर सकता हूँ. ये नाटक देखने के बाद ही कुंदनशाह ने मुझे ‘जाने भी दो यारों’ का रोल दिया.
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