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देशभक्ति कविताएँ

द्वारा: sahendra     लेखक : sahendra singh ''Thakur G''
ª
 
देशभक्ति कविताएँ

वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|
बना रहे हथियार मुझे क्यों अपनो से ही लड़ने का|

जिनने अपनाया मुझको वे सबकुछ अपना भूल गए,
मात्रु -भूमि पर जिए-मरे हंस-हंस फंसी पर झूल गए|
वीर शिवा,राणा,हमीद लक्ष्मीबाई से अभिमानी,
भगतसिंह,आजाद,राज,सुख औ बिस्मिल से बलिदानी|
अवसर चूक न जाना उनके पद-चिन्हों पर चलने का
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|

करनेवाले काम बहुत हैं व्यर्थ उलझनों को छोड़ो,
मुल्ला-पंडित तोड़ रहे हैं तुम खुद अपनों को जोड़ो|
भूख,बीमारी,बेकारी,दहशत गर्दी को मिटाना है,
ग्लोबल-वार्मिंग चुनौती से अपना विश्व बचाना है|
हम बदलें तो युग बदले बस मंत्र यही है सुधरने का
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|

चंदा-तारे सुख देते पर पोषण कभी नहीं देते,
केवल धरती माँ से ही ये वृक्ष जीवन रस लेते|

जननी और जन्म-भूमि को ज़न्नत से बढ़कर मानें,
पूर्वज सारे एक हमारे इसी तथ्य को पहचानें|
जागो-जागो यही समय है अपनीं जड़ें पकडनें का|
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|

शहीद की मां को प्रणाम--

कर गयी पैदा तुझे उस कोख का एहसान है
सैनिकों के रक्त से आबाद हिन्दुस्तान है
तिलक किया मस्तक चूमा बोली ये ले कफन तुम्हारा
मैं मां हूं पर बाद में, पहले बेटा वतन तुम्हारा
धन्य है मैया तुम्हारी भेंट में बलिदान में
झुक गया है देश उसके दूध के सम्मान में
दे दिया है लाल जिसने पुत्र मोह छोड़कर
चाहता हूं आंसुओं से पांव वो पखार दूं
ए शहीद की मां आ तेरी मैं आरती उतार लूं.

घोर अंधकार हो,
चल रही बयार हो,
आज द्वार-द्वार पर यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।
शक्ति का दिया हुआ,
शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ,
यह स्वतंत्रता-दिया,
रुक रही न नाव हो
ज़ोर का बहाव हो,
आज गंग-धार पर यह दिया बुझे नहीं,
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है।

यह अतीत कल्पना,
यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना,
यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो,
युद्ध, संधि, क्रांति हो,
तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं,
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है।

तीन-चार फूल है,
आस-पास धूल है,
बाँस है -बबूल है,
घास के दुकूल है,
वायु भी हिलोर दे,
फूँक दे, चकोर दे,
कब्र पर मज़ार पर, यह दिया बुझे नहीं,
यह किसी शहीद का पुण्य-प्राण दान है।

झूम-झूम बदलियाँ
चूम-चूम बिजलियाँ
आँधियाँ उठा रहीं
हलचलें मचा रहीं
लड़ रहा स्वदेश हो,
यातना विशेष हो,
क्षुद्र जीत-हार पर, यह दिया बुझे नहीं,
यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है।

केरल से करगिल घाटी तक
गौहाटी से चौपाटी तक
सारा देश हमारा

जीना हो तो मरना सीखो
गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,

लगता है ताज़े लोहू पर जमी हुई है काई
लगता है फिर भटक गई है भारत की तरुणाई
काई चीरो ओ रणधीरों!
ओ जननी की भाग्य लकीरों
बलिदानों का पुण्य मुहूरत आता नहीं दुबारा

जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,

घायल अपना ताजमहल है, घायल गंगा मैया
टूट रहे हैं तूफ़ानों में नैया और खिवैया
तुम नैया के पाल बदल दो
तूफ़ानों की चाल बदल दो
हर आँधी का उत्तर हो तुम, तुमने नहीं विचारा

जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,

कहीं तुम्हें परबत लड़वा दे, कहीं लड़ा दे पानी
भाषा के नारों में गुप्त है, मन की मीठी बानी
आग लगा दो इन नारों में
इज़्ज़त आ गई बाज़ारों में
कब जागेंगे सोये सूरज! कब होगा उजियारा

जीना हो तो मरना सीखो, गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा

संकट अपना बाल सखा है, इसको कठ लगाओ
क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे मिल कर बोझ उठाओ
भाग्य भरोसा कायरता है
कर्मठ देश कहाँ मरता है?
सोचो तुमने इतने दिन में कितनी बार हुँकारा

जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा.

"मन जहां डर से परे है
और सिर जहां ऊंचा है;
ज्ञान जहां मुक्*त है;
और जहां दुनिया को
संकीर्ण घरेलू दीवारों से
छोटे छोटे टुकड़ों में बांटा नहीं गया है;
जहां शब्*द सच की गहराइयों से निकलते हैं;
जहां थकी हुई प्रयासरत बांहें
त्रुटि हीनता की तलाश में हैं;
जहां कारण की स्*पष्*ट धारा है
जो सुनसान रेतीले मृत आदत के
वीराने में अपना रास्*ता खो नहीं चुकी है;
जहां मन हमेशा व्*यापक होते विचार और सक्रियता में
तुम्*हारे जरिए आगे चलता है
और आजादी के स्*वर्ग में पहुंच जाता है
ओ पिता
मेरे देश को जागृत बनाओ"
प्रकाशन तिथि: 22 अप्रैल, 2011   
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Top Websites Reviews

  1. 10. ghhg

    wer

    it is truely a good poem

    0 स्तर 05 जून 2014
  2. 9. rishabh sharma

    english

    it is so bad and boring poem who mad made this poem

    0 स्तर 05 जून 2014
  3. 8. pagal

    hindi

    ache se kaam kara karo sadi se kavita bana rakhi hai it is not a good poem

    0 स्तर 05 जून 2014
  4. 7. samadardhi

    my opinion

    frankly speaking it is the best ever patriotic poem i have ever read but truely speaking it's a long poem thanks. FROM-NALCO NAGAR-DIST-ANGUL,ODISHA

    2 स्तर 13 जनवरी 2013
  5. 6. garvit chaudhary

    useful

    yey peom badi hai or achi bhi hai it is useful for me

    4 स्तर 14 अगस्त 2012
  6. 5. kesari viharika moti

    down market kavitha

    its sooooooooooooooooo boring toooooooo long i just hate it

    7 स्तर 10 जून 2012
  7. 4. Pushkal

    Ye Kavitaaen

    Ati uttam kaarya hai yae......baut dhanyawad.......kavitaaen dekhakar mujhe bahut khushi huyi........VANDE MATRAM

    5 स्तर 20 सितम्बर 2011
  8. 3. Gajendra Sharma

    Indepandance

    I dont knew how i recd Indepance but it value don't know our all citizen./so plz Naman un shahido ko jo maatrbhumi ke leye shahid hue.parnam

    6 स्तर 10 अगस्त 2011
  9. 2. sahendra singh ''Thakur G''

    thanxxx

    thanx himani ki aapko meri kavita achi lagi n badi hai i know but kya hai ki soch jitni badi ho achi hoti hai ......

    3 स्तर 04 अगस्त 2011
  10. 1. himani rathour

    achi kavita

    muujhe ye kavita atyant achi lagi par ye kuch jyaada hi badi hai................

    4 स्तर 02 अगस्त 2011
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