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ईसुरी का बुंदेली लोक साहित्य

Summary rating: 3 stars 4 समीक्षा
Summary by : Mahendra Yadav
विजिट्स: 540
शब्द: 900
प्रकाशन तिथि: मार्च 13, 2007

भारतेन्दु युग में लोककवि ईसुरी को बुन्देलखण्ड में जितनी ख्याति प्राप्त हुई उतनी अन्य किसी कवि को नहीं। ईसुरी की फागें और दूसरी रचनाएं आज भी बुंदेलखंड के जन-जन में लोकप्रिय हैं। हालांकि उनके साहित्य पर अश्लीलता के आरोप भी लगे हैं। उन्होंने अपनी सारी रचनाएं अपनी प्रेमिका रजऊ को संबोधित की हैं। यहां पर कुछ लोकप्रिय रचनाएं
और उनकी सरल हिंदी व्याख्या दी जा रही है। १. हमका बिसरत नई बिसारी, हेरन हंसी तुम्हारी।
जुवन विशाल चाल मतवारी, पतरी कमर इकारी।
भौंअ कमान बना के ताने, न तिरीछी मारी।
ईसुर कांत हमारे को दौ, तनक हेर लौ प्यारी।

प्रिय मैं तुम्हारी मुस्कुराती हुई नजर भुलाना चाहते हुए भी नहीं भुला पा रहा हूँ। तुम्हारे विशाल पयोधर, मतवाली चाल और इकहरी पतली कमर है। तुम्हारी भौंहें धनुष-बाण सी तनी हुई है जिनसे तुम तिरछी नजर मारती हो। हे प्रिय एक बार मेरी ओर भी इसी मुस्कुराती हुई न से देखो।

२. श्रीफल धरै फरै चोली में, मदरस चुअत लली को।
लेत पराग अधर के ऊपर, विकसों कमल कली को।
ईसुर कान्त बचायों रहियो छिये न छेल गली को।

यह तनी रुपी बगीचा प्रियतम के लिए है, इसे सुहाग के अमृत से सींचा गया है। चोली में श्रीफल रुपी उरोज फले हैं जिनसे मदन रस टपकता है। कमल के फूल के समान अधरों से पराग लिया जाता है। ईसुरी कहते हैं इन उरोजों और अधरों को गली के रसिकों से बचाये रखना वे इन्हें छू न पायें। ३. जोवन मढियादार कलश भरे कारे बूंदा के।

नायिका के कुच छोटे मन्दिर के समान हैं। जिनमें कलश के रुप में काले रंग का बूंदा --बिन्दी कापुलिंग रखा हुआ है। कवि का संकेत कुचाग्रों की ओर है।४. जोअना दैय राम ने तोरे, सब कोई आवत दौरे।
आय नहीं खॉड़ के धुल्ला पिये लेत न घोरे।
का भओ जात हाथ के फेरे, लेत नहीं कछु तोरे।
पंछी पिये घटे नहीं जाती, ईसुरी प्रेम हिलोरें।

ईश्वर ने तुम्हें उरोजों का उपहार दिया है। इन्हें के कारण लोग तुम्हारे पास दौड़े-दौड़े आते हैं। ये शक्कर के चने खिलौने नहीं हैं कि कोई इन्हें घोलकरपी जायेगा। इन पर जरा हाथ फेरने से क्या होगा, कोई इन्हें तोड़ तो नहीं लेगा, ईसुरी कहते हैं कि पक्षी के जल पीने से समुद्र की हिलोरें कम नहीं होती। ५. फूट जात नैचे की कलिया, टूट जाय दो कोने।
जौन वसत को गुदरी सौ, भौ ऊखौ उखरी होने।
अबई विशाल छाल हो जाने, जै गालन के कोने।
सबरे मन्त्र सासरे ईश्वर, जान न देत निरोने।

जब तक रजऊ(काल्पनिक नायिका)ससुराल नहीं गई, तभी तक उसके उरोज ठीक है। गौना होते ही उसकी नीचे की कलियाँ फूट जयेगी और कुचाग्र टूट जायेंगे। अंगूठी की मुंह जैसी वस्तु उखरी बन जायेगी। गाल फैलकर चौड़े हो जायेंगे। ईसुरी कहते हैं कि ससुराल जाने पर नायिका की कोई भी चीज साबित नहीं रहती है। ६. जुबना बीते जात लली के, पड़ गै हाथ छली के।
कसे रैत चोली के भीतर, जैसे फूल कली के।
कात ईसुरी मसके मोहन, जे है कोउ भली के।

नायिका के उरोज लटकने लगे हैं। वे किसी छलिया के हाथ पड़ गये हैं, वह उन्हें मुहल्ला गली में चाहे जब मसकता रहता है, इससे वे नीचे को ढलने लगे। वह तो उन्हें अपनी चोली में कसकर छिपाये रहती है जिस प्रकार कली चटकने पर फूल खिलता है। उसी प्रकार चोली खोलने पर सारा यौवन उमड़ पड़ता है। ईसुरी कहते हैं कि ये उरोज इतने अच्दे हैं कि मोहन जैसे किसी रसिक के हीमसलने काबिल हैं, किसी छलिया के नहीं। ये किसी संभ्रात महिला के हैं। ७. रोजऊ हँस-हँस के मन भरती, कबहुँ न मन की करती।
देती नहीं दगाबाजी की, जेई बात अखरती।
हमसे सदा अदैनी राती औरउ रोज बितरती।
छिपा न राखी खुलकै कै दो, कौन बात खाँ डरतीं।
तुममें प्रान अटक रय ईसुर, आंखन से न टरतीं।

तुम रोज हंस-हंस के मेरा मन भरती हों पर मेरे मन की इच्छा कभी नहीं पूरी करती तुम मुझे देती नहीं हो तुम्हारी ये दगाबाजी हमेशा अखरती रहती है, तुम मुझसे रोज छरकती रहती हो और दूसरों को रोज बांटती हो तुम खुलकर मुझे बताओ कि तुम्हें काहे का डर है। ईसुरी कहते हैं कि मेरे प्रान तो तुम पर अटके हैं तुम मेरी आंखों से दूर नहीं होतीं। ८. हमसे चुमवा लो जा मुइया, फिर पछतैहो गुइयां।
प्यारे लगे कपोल गोल दो, परे हसत में कुइयां।
चार दिना की जा फुलवारी, हो न जाय उजरैयां।
ईसुर कहत कहुँ बैठी देखी है, सूखे आम पै टुइयां।

हे प्यारी, हमसे एक बार अपना मुंह चुमवा लो। तुम्हारे दोनो गोल-गोल गाल बड़े प्यारे लगते हैं जब तुम हंसती हो, तो इनमें गड़ढे पड़ जाते हैं इसे उजड़ने न दो। यौवन की ये फुलवारी चार दिन की है। ईसुरी कहते हैं कि तुमने कहीं सूखे आम पर मैना बैठी देखी है। यौवन की ये फुलवारी उजड़ गयी तो कोई पूछने वाला नहीं है। ९. इनको गरब करो सो नाहक, जे न भये किसी के।
ऐसे बिला जात हैं जैसे, बलबूला पानी के।
ईसुर मजा लूट लो ईसे, अपनी इस ज्वानी के।

किसी का यौवन सदा नहीं रहा। अगर किसी का रहा होय तो हमें बताओ इस यौवन पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। यह किसी का नहीं, यह ऐसे समाप्त हो जाता है जैसे पानी का बुलबुला। ईसुरी कहते हैं कि अपनी इस जवानी का भरपूर मजा लूट लो।
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