ईद मीलादुन्नबी का उत्सव -1
(ऐतिहासिक एंव धार्मिक दृश्य )
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
मैं अति मेहरबान और
दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ।
(भाग-1)
हर प्रकार की प्रशंसा और गुण-गान सर्व संसार के पालनहार अल्लाह के लिए योग्य है जिस ने हमें अपनी महान कृपा से इस्लाम की नेमत से सम्मानित किया -जिस से बढ़ कर इस दुनिया में कोई अन्य नेमत नहीं- और उसे अपने अन्तिम सन्देष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हाथों पर सम्पूर्ण कर के हमारे लिए पसन्द कर लिया। तथा अल्लाह की कृपा और शान्ति अवतरित हों उस प्रतिष्ठित पैग़म्बर पर जिन्हों ने इस्लाम के प्रसार का कर्तव्य उम्मत की खैरखाही (शुभ चिंता) के साथ उत्तम ढंग से पूरा किया और उम्मत को एक उज्ज्वल पथ पर छोड़ कर गये जिस से वही व्यक्ति भटके गा जो अत्यन्त अभागा होगा।
अत: अब इस धर्म में किसी कमी या वृद्धि की कोई गुन्जाईश नहीं। किन्तु इस्लाम के दुश्मनों ने -जिन्हें इस्लाम का प्रभुत्व और फैलाव काटे खाता है और उन्हें क्रोध और ग़ुस्से से ग्रस्त कर देता है- कुछ लोगों के लिए बिद्अतों को संवार कर उन्हें अच्छे पोशाक में प्रस्तुत किया है और उन्हें ज़ुह्द, परहेज़गारी, अल्लाह की समीपता और रसूल से महब्बत के रूप में प्रकट किया है, जिस का आशय उनके धर्म को बिगाड़ना है ताकि सुन्नतें अपरिचित और अनजान हो जाएँ और उन का स्थान बिद्अतें ग्रहण कर लें। साथ ही साथ कुछ दुष्ट उलमा और तसव्वुफ वालों ने इसे लोगों के बीच सरदारी और कमाई का साधन बना कर इन बिद्अतों को अधिकाधिक फैलाया और प्रचलित किया यहाँ तक कि मुसलमानों में जंगल की आग के समान फैल गईं और साधारण लोगों ने इन्हें नेकी और पुण्य का कार्य समझकर अपनी आँखों से लगा लिया और इनकी सुरक्षा और संरक्षण को अनिवार्य समझने लगे।
ऐसी अवस्था में सुन्नत का पालन करना और बिद्अत के विरूद्ध उठ खड़े होना यथाशक्ति प्रत्येक मुसलमान विशेषकर धर्म ज्ञानियों का कर्तव्य है। निम्नलिखित लेख इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।
वर्तमान समय में फैली हुई बिद्आत में से एक घृणित बिद्अत रबीउल-अव्वल की बारहवीं तारीख को पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस के उत्सव (जश्न) के रूप में मनाना है, जिसे दुनिया के विभिन्न देशों में मुसलमान बड़े हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। किन्तु इस जश्ने मीलाद का धार्मिक तथ्य क्या है? इसका ऐतिहासिक आधार क्या है? इस घिनावनी प्रथा का मुस्लिम समुदाय में कहाँ से चलन हुआ? और इसका अविष्कार करने वालों का इसके पीछे क्या उद्देश्य था? अधिकांश लोग इस से अपरिचित और अचेत हैं। यदि इसकी वास्तविकता को प्रकाश में लाया जाए और इसका अविष्कार करने वालों के मुख से पर्दा उठाया जाए तो सुन्नते रसूल के शैदाई और महब्बते रसूल के नाम पर जान निछावर करने वाले मुसलमान समझ-बूझ से काम लेते हुए इस असत्य और अवैद्ध परम्परा से अपने आप को दूर और अलग-थलग रखें गे और इस का स्वयं भी विरोध करें गे।
क़ुर्आन और हदीस में इसका उल्लेख होना तो बहुत दूर की बात है, कहीं इसका संकेत तक भी नहीं मिलता।
पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने पूरे जीवन काल में न तो स्वयं अपना जन्म दिवस मनाया, न अपने किसी सहाबी को इसका आदेश दिया और न ही अपने मरने के बाद इसे मनाने का कोई संकेत दिया। हाँ, आप ने अपने साथियों को इस बात की चेतावनी अवश्य दी कि कहीं ईसाईयों के समान मेरी प्रशंसा करने में सीमा को पार न कर जाना।
इस धर्ती पर सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से बढ़ कर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अपार महब्बत करने वाला, पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नतों का सर्वाधिक ज्ञान रखने वाला और पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत -धर्म शास्त्र- का अत्यधिक पालन करने वाला कोई नहीं। फिर भी किसी एक -मात्र एक- सहाबी ने भी आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस को नहीं मनाया।
सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के पश्चात सर्वश्रेष्ठ लोग वह हैं जो उनके बाद आए, जिन्हें ``ताबईन´´ के नाम से जाना जाता है। इनके समय काल में भी पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म दिवस नहीं मनाया गया। ताबईन के बाद के समय काल में भी किसी ने ईद मीलादुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का त्योहार नहीं मनाया।
चार प्रसिद्ध इमाम अर्थात: इमाम अबू हनीफा, इमाम मालिक, इमाम शाफई और इमाम अहमद -रहिमहुमुल्लाह अजमईन- जिनका मुसलमानों के निकट बहुत बड़ा महत्व और इस्लाम की शिक्षा के प्रसारण में बहुत बड़ा योगदान है( इन में से किसी एक इमाम ने भी पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस को न तो स्वयं मनाया और न ही इसे मनाने का किसी को सुझाव दिया। बल्कि इनके समय काल में इसका नाम तक नहीं सुना गया।
प्रश्न उठता है कि यह बिद्अत कब, कैसे और कहाँ से आई? इस का अविष्कार -ईजाद- करने वाले मुसलमान भी थे या? ....