कभी प्रियतमा, कभी मानिनी बन जाती है....
मचलती है, झुमती है मस्ती में,
अंगडाई भी लेती है....
सांसों मे समाती है नटखट,
हलकासा चुमा भी लेती है.....
बहलाती है, फुसलाती है,
मनाती है, रुठने का दम भी भरती है....
सताती है, करती है गुदगुदी भी,
कमबख्त।...अट्खेकियां भी कर जाती है.....
करवाती है शीशिर का इंतजार,
वैसे बेचारी, नदारद ही रहती है.....
ये है ठंडी मदमस्त हवा,
तन्-बदन में मस्ती जगाती है......
ग्रीष्म में गुस्सा आता है इसे,
अग्नी-शिखा का रुप धर लेती है....
तब 'लू' बनकर झपट लेती है कालिका।
तब पसीने से तर-बतर कर जाती है.....
तन्-बदन जलाकर भी ये,
उमंग को ठंडा कर जाती है....
पास किसीको आने से रोकती है,
दो दिलों में दूरिया बनाती, चली जाती है....