जंगलसे वापस, घर की और....
अपनी प्यास बुझाने की
खातिर,
चप्पा चप्पा जंगल का छान मारा मैने...
कहीं कोई झरना या तालाब न था,
दिन पूरा घुमते हुए, यूं ही गुजारा मैने.....
पर..उस घने जंगल से बाहर निकलना,
नहीं चाहा दिलने किसी तरह से भी...
वरना पानी भी था जंगल से बाहर...
कल कल बहती, सरिता के रुप में...पर,
जंगल में ही प्यास बुझाना ठान लिया था मैनै ।
सोचा था जीवन अब बिताऊं यहां...
इसी जंगल का एक प्राणी बन कर्....
यहीं गुजारा करलूं अब, जैसे भी हो....
बाहर का रुख ना करु कभी भी अब तो....
अंतिम निर्णय तक ले लिया था यही मैने...
रात के घूप अंधेरे में दो चमकती आंखें.. और,
जंगलसे बाहर जाती हुई पदचाप सुनी मैने..
पीछे पीछे हो लिया अनमना सा मै तब....
जंगल से बाहर बहती नदी का पथ था...
प्यास बुझाने जंगल से बाहर जाना तय था अब...
..और बदल कर निर्णय अपना उस घडी...
निकला मै एक प्यासा, जंगल से बाहर यारों...
प्यास भी बुझाई बहते जल की धारा से...
दो चमकती आंखें तो वापस मुड गई जंगल की ओर,
पर्...अब घर की ओर वापस लौट जाना चाहा मैनै...