मे जब सोचता हूँ,खुद के बारे मे तो उदास हो उठता हूँ.
एक अजीब सा ख्याल मुझे डराने लगता है.जैसे मेरा बहुत कुछ खो गया है या शायद बहुत कुछ खोने जा रहा है, पर क्या ?
ये तो मे भी नही जनता पर हाँ शायद कुछ तो है जो बराबर एहसास करता है,की कुछ पाने की खुशी कैसी होगी. ये एहसास करता है की इस खुशी पर मेरा भी अधिकार है.पर खुशी क्या यूँ ही मिल जाती है ?बिल्कुल नही क्योकि हर अच्छी चीज़ कीमत मांगती है पूरी कीमत त्याग की ,मेहनत की ,लगन की तब कहीं इसके एक छोटे से अंश का सुख प्राप्त होता है. किंतु ये सुख एक उद्देश्य के, एक लक्ष्य के घर मे रहता है,और सुख तक पहुँचने से पहले इसका दरवाजा पार करना ज़रूरी है.
क्योकि मेहनत तो वो बैल भी करता है, जो गाड़ी को खींचता है तो क्या वो सुखी है ?नही ना क्योकि वो उद्देश्यहीन है. उद्देश्य के बिना हम अपनी मंज़िल नही पा सकते है.
इसलये उद्देश्य ज़रूरी है,और उद्देश्य की पूर्ति के लिए लगन क्योकि हम कोई भी काम शुरू तो जोश से करते है.किंतु फिर हम उद्देश्य से छूटने लगते है,जैसे तालाब मे पत्थर फेकने पर कुछ देर के लिए लहरे उठती तो है किंतु फिर सामान्य हो जाती है.----------मनोज
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