अंग्रेजी और वैश्वीकरण
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प्रकाशन तिथि: अप्रैल 11, 2006
अंग्रेजी और वैश्विक ग्राम
यदि हम विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं पर एक दृष्टि डालें, तो हमें ज्ञात होगा कि चीनी (Mandarin and Putoghna) और अंग्रेजी भाषा विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली दो भाषाएं हैं और इस सहस्राब्दी में इन दो भाषाओं को बोलने वाले लोगों की संख्या एक अरब के आंकड़े को भी पार कर गई है. यद्यपि यह तथ्य पूरी तरह से ज्ञात नहीं है कि इन दोनों में से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा कौन-सी है ? इससे संबंधित आंकड़े समय-समय पर बदलते रहते हैं. जब सूर्य पश्विमी प्रशांत में होता है, तो चीनी सर्वाधिक प्रयोग में आने वाली भाषा बन जाती है और जब अटलांटिक और चीन सो जाते हैं तो अंग्रेजी आगे निकल जाती है. जहां तक भौगोलिक प्रसार का प्रश्न है, अंग्रेजी निर्विवाद रूप से विश्व में सर्वोच्च स्थान पर है और जिस प्रकार विश्व के अधिसंख्य देशों में अंग्रेजी भाषा का शिक्षण एवं प्रसार हो रहा है, यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि 21वीं शताब्दी के प्रारंभिक भाग में अंग्रेजी अन्य सभी भाषाओं को पीछे छोड़कर आगे निकल जाएगी.
चीनी भाषा जहां चीन, ताईवान, थाईलैंड , मलयेशिया, सिंगापुर और वियतनाम में बोली जाती है, वहीं अंग्रेजी का प्रयोग विश्व के 70 से भी अधिक देशों में किया जाता है. भाषा विशेषज्ञों का अनुमान है कि मानस, अगले एक या दो दशकों में एशिया महाद्वीप में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या विश्व में किसी भी अन्य महाद्वीप से सर्वाधिक होगी. इसके अतिरिक्त, भारत भी तेजी से अंग्रेजी भाषा में साहित्यिक गतिविधि का प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है. सर्वेक्षकों के अनुसार आने वाले समय में बहुभाषी पृष्ठभूमि के बदले एक अंत:राष्ट्रीय सहायक भाषा के रूप में अंगेजी को स्थापित करने में एशिया एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
अंग्रेजी भाषा की विरासत ने भारतीयहमारे स्वतंत्रता संघर्ष, हमारे साहित्य, शिक्षा और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के संपूर्ण तंत्र पर गहरा प्रभाव डाला. अंग्रेजी ने इस विश्वरूपी घर की खिड़की का कार्य किया है. गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सर सी. राजगोपालाचारी, डॉ. बी. आर. अंबेडकर और अन्य महान स्वतंत्रता सेनानियों ने एक विश्व दृष्टिकोण को विकसित किया. सवींद्रनाथ टैगोर जैसे साहित्यकार और डॉ. सी.वी. रामन जैसे वैज्ञानिक ने अपने-अपने क्षेत्र में विश्व स्तर पर ख्याति अर्जित की. महान दार्शनिक प्लेटो के सिद्धांत का सार प्रस्तुत करने वाले डॉ. सी.वी. रामन ने हिंदु धर्म (Hinduism) के सार से पश्चिमी जगत को परिचित कराया.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जहां हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को अच्छा प्रोत्साहन मिला, वहीं हमने अंग्रेजी को एक विदेशी भाषा मानकर एक किनारे पर नहीं फेंका और एक व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ इसे अपनाया. हमारा यह निर्णय कितना अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ, यह हमें आज दिखाई दे रहा है जहां भारत के पास विश्व की ऐसी सर्वाधिक श्रमशाक्ति है, जो अंग्रेजी भाषा में दक्ष है. अपने इसी सर्वोत्तम गुण के बल पर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITS) स्तरीयता के मामले में अमेरिका और ब्रिटेन के संस्थानों से कहीं भी कम नहीं हैं.
हमारे यहां सरोजिनी नायडू, डॉ. मुल्कराज आनंद, खुशवंत सिंह, राजा राव, वेद मेहता, कमला मार्कण्डेय, विक्रम सेठ, अरूंधति राय आदि कई महान अंग्रेजी लेखकों एवं लेखिकाओं ने जन्म लिया. विभिन्न शहरों से अंग्रेजी में कई उच्च स्तरीय समाचार पत्र एवं पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं. इन्होंने एक अभिजात वर्ग तैयार किया है, जो 24 घंटे के अंग्रेजी समाचार चैनालों से स्वयं को नवीनतम घटनाओं से ‘ अपडेट’ रखते हैं. अंग्रेजी भाषा के प्रकाशन घरानों की स्तरीयता के मामले में भी भारत उच्च स्थान पर है. भारत के अधिकतर शहरों में नर्सरी कक्षा से ही विद्यार्थी को अंग्रेजी पढ़ाई जाती है और हजारों स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही है. सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमारे युवा इंजीनियर, डॉक्टर, एम.बी.ए. और अन्य व्यावसायिक लोग अंग्रेजी भाषा में दक्ष होने के कारण विश्व के किसी भी स्थान पर कार्य करने में समक्ष होते हैं.
भारतीय लोग चाहे सेंटरों में कार्य करें, सॉफ्टवेयर इंजीनियर हों, मानव संसाधन प्रबंधक हों, जनसंपर्क अधिकारी हों, पत्रकार हों, मीडियाकर्मी हों, टी.वी. चैनलों मे उद्घोषक, तकनीशियन या अन्य कोई कार्य करें, फिल्म अभिनेता, खिलाड़ी, व्यापारी या फिर मैकेनिकल क्षेत्र में कार्य वाले इंजीनियर हों, वे अंग्रेजी भाषा में अपनी दक्षता के कारण अन्य लोगों से बेहतर कार्य कर सकते हैं. यदि वर्तमान चलन पर दृष्टि डालें, तो अंग्रेजी भाषा का प्रशिक्षण ऐसे छोटे शहरों और नगरों के युवाओं को भी दिया जा रहा है, जो स्नातक या स्नातकोत्तर करने के बाद भी अंग्रेजीभाषा में प्रवीण नहीं हो पाते हैं.
भाषा के अध्ययन पर कर्नाटक में एक गहरा विवाद छिड़ा हुआ है. कन्नड़ भाषा के समर्थक चाहते हैं कि अंग्रेजी भाषा पांचवीं कक्षा में पढ़ाई जाए, जबकि अन्य वर्गो की मांग है कि यह भाषा तीसरी कक्षा से पढ़ाई जाए. वहां एक और वर्ग भी है, जो यह चाहता है कि अंग्रेजी भाषा पहली कक्षा से आंरभ कर दी जाए. पिछले कई वर्षो से कन्नड़ भाषा का समर्थन करने वाले ‘दलित’ आज कन्नड़-समर्थित आंदोलन से अलग होकर अंग्रेजी भाषा के अनुयायी बन गए हैं और चाहते हैं कि कक्षा प्रथम से ही अंग्रेजी भाषा पढ़ाई जाए. अब समय आ गया है कि भारत देश भर के लाखों स्कूलों में अंग्रेजी भाषा की यथासंभव सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रदान की जाए. वर्तमान समय में महानगरों और अन्य बड़े शहरों के कुछ सार्वजनिक स्कूलों को छोड़ दिया जाए, तो अधिकतर स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली अंग्रेजी का स्तर औसत से भी निम्न है.