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एड्स - जागरूकता ही है सबसे बड़ा हथियार

Summary rating: 2 stars 8 समीक्षा
लेखक :
Summary by : garima g
विजिट्स : 748  शब्द: 900   प्रकाशन तिथि: अप्रैल 11, 2006
जागरूकता: एड्स से लड़ने
का सबसे बड़ा हथियार
एड्स (AIDS) की शुरूआत भले ही एक छोटी-सी चिंगारी की तरह हुई थी, किंतु आज यह जंगल की आग के समान पूरे विश्‍व में फैल चुका है और इतना विकराल रूप ले चुका है कि इसे रोक पाना कठिन लग रहा है.
उपलब्‍ध नवीनतम आंकड़ो के अनुसार वर्ष 2004 तक भारत में एच.आई.वी. से पीडि़त लोगों की संख्‍या लगभग 5.1 मिलियन थी. यद्यपि ऐसा लग रहा है कि प्रसार का यह स्‍तर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्‍ट्र में स्थिर है, किंतु फिर भी उच्‍च जनसंख्‍या वाले कई अन्‍य राज्‍यों में इसके मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं, जिसका अर्थ यह हुआ कि एच.आई.वी. दर तेजी से बढ़ रही है. निश्वित रूप से जागरूकता के अभाव, असु‍रक्षित संभोग और स्‍वास्‍थ्‍य उपचार की खराब प्रणालियों के कारण इन मामलों में वृद्धि हुई है.
डब्‍ल्‍यू.एच.ओ.-यू.एन. एड्स की रिपोर्ट देश के विभिन्‍न क्षेत्रों में एड्स के बढ़ते मामलों के कुछ विशेष कारणों पर प्रकाया डालती है. भारत के औद्योगीकीकृत पश्विमी और दक्षिणी राज्‍यों (महाराष्‍ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु) मणिपुर एवं नगालैंड में एक प्रतिशत से भी अधिक महिलाएं एच.आई.वी. से पीडि़त हैं. जहां दक्षिणी राज्‍यों और महाराष्‍ट्र में इसका प्रमुख कारण असुरक्षित संभोग है, तो उत्तर-पूर्वी राज्‍यों में दवाइयों के इंजेक्शन में संक्रमित सुइयों के प्रयोग के कारण अधिक मामले प्रकाश में आए हैं. यह महामारी ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैल रही है.
राष्‍ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के कार्यकर्ताओं के लिए सबसे अधिक चिंता का विषय है ‘कॉमर्शियल सेक्‍स’ के माध्‍यम से एड्स के मामले में वृद्धि होना. देश के अधिकतर भागों में ‘कॉमर्शियल सेक्‍स’ (नागालैंड और तमिलनाडु में नशीले इंजेक्शन सहित) ही इस बीमारी का प्रमुख कारण बना है 2003 में किए गए एक सर्वेक्षण से यह पता चला है कि कर्नाटक में 14 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 19 प्रतिशत कॉमर्शियल सेक्‍स वर्कर्स एच.आई.वी. से ग्रस्‍त हैं. हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि मैसूर (कर्नाटक) में 26 प्रतिशत सेक्‍स वर्कर एच.आई.वी.-पॉजिटिव पाई गई हैं. यह आश्‍चर्य की बात नहीं है, क्‍योंकि यहां केवल 14 प्रतिशत महिला सेक्‍स वर्कर ही अपने ग्राहकों के साथ कॉन्‍डम का प्रयोग करती हैं. जबकि 91 प्रतिशत सेक्‍स वर्करों ने अपने नियमित ग्राहकों के साथ कभी कॉन्‍डम का प्रयोग नहीं किया.
कोलकाता के सोनागाछी रेड लाइट एरिया में सेक्‍स वर्करों द्वारा सुरक्षात्‍मक मानदंड अपनाए जाने के कारण वहां एच.आई.वी. के मामले में उल्‍लेखनीय कमी आई है. सोनागाछी में 85 प्रतिशत से भी सेक्‍स वर्करों द्वारा कॉन्‍डम प्रयोग किए जाने के कारण 2004 में वहां सेक्‍स वर्करों के बीच एच.आई.वी. की दर 4 प्रतिशत से भी नीचे आ गई. इसके विपरीत, आंकड़ों के अनुसार, मुबई (महाराष्‍ट्र) में कॉन्‍डम प्रयोग को प्रोत्‍साहित किए जाने के लिए छुट-पुट प्रयास प्रभावकारी सिद्ध नहीं हुए. राष्‍ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के आंकड़ों के अनुसार मुंबई में सेक्‍स वर्करों के बीच एच.आई.वी. की दर 52 प्रतिशत से भी अधिक हो सकती है.
यू.एन. एड्स के समक्ष बड़ी संख्‍या में ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं, जहां महिलाओं को अपने पतियों से यह बीमारी मिली, जो कहीं असुरिक्षत संभोग से इस बीमारी की चपेट में आ गए थे. 2003 में कर्नाटक और नागालैंड के ग्रामीण क्षेत्रों में एक प्रतिशत से भी अधिक महिलाएं एच.आई.वी.- पॉजिटिव पाई गई हैं. ऐसी अधिकतर महिलाएं अपने पतियों के कारण इस रोग का शिकार बनीं, जो नियमित रूप से सेक्‍स वर्करों के पास जाते हैं या जाते थे.
बहुत कम लोग ही इस बात को जानते हैं कि भारत में विभिन्‍न महामारियों के प्रसार में पुरूषों के बीच परस्‍पर संभोग की भी एक भूमिका रही है. कुछ अध्‍ययनों से यह पता चला है कि भारत में एक बड़ी संख्‍या में पुरूष समलैंगिकता व्‍याप्‍त है. ऐसे छह प्रतिशत से भी अधिक समलैंगिक चेन्‍नई (तमिलनाडु) के स्‍लम क्षेत्रों में पाए जाते हैं.
राष्‍ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (NACP) I और II का कोई उल्‍लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ा. पहला कार्यक्रम 1992 में आरंभ किया गया और इस केंद्रीय कार्यक्रम को विश्‍व बैंक से वित्तीय सहायता प्राप्‍त हुई. यह कार्यक्रम 1997 में समाप्‍त हुआ. दूसरे कार्यक्रम की शुरूआत 1999 में हुई और यह अपने 2006 में प्रारंभ होगा, जो ग्रामीण क्षेत्रों पर केंद्रित होगा. उल्‍लेखनीय है कि शहरी क्षेत्रों (41 प्रतिशत) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में एच.आई.वी. के मामले का प्रतिशत 59 तक पहुंच गया है. स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री श्री अम्‍बुमणि रामदौस के अनुसार एन.सी.सी.पी. के तीसरे चरण में वैश्विक सहयोगियों और स्‍टेकधारकों (कॉरपोरेट्स) सहित के साथ मिलकर कई योजनाएंबनाई गई हैं.
भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सेक्‍स के विषय को एक नए दृष्टिकोण से देखने का आह्वान किया. उन्‍होंने कहा कि सेक्‍स और सेक्‍स शिक्षा के विषय पर परिवारों, मित्रों और समाज को रूढि़वादी बंधनों से मुक्‍त किया जाना चाहिए तथा इस पर बात करने में किसी को कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए, उनके अनुसार जागरूकता ही असुरक्षित संभोग से फैलने वाली इस बीमारी से लड़ने का एकमात्र हथियार है. प्रयोग और र‍क्‍त-आधान के संबंध में पर्याप्‍त जागरूकता के प्रसार पर भी बल दिया.
अब प्रश्‍न उठता है कि युवाओं के बीच कॉन्‍डम वितरण क्‍या विवाहेतर सेक्‍स को बढ़ावा देने जैसा नहीं है ? चाहे जो भी हो, किंतु हमारा पहला लक्ष्‍य युवाओं में सेक्‍स शिक्षा और जागरूकता के अभाव के कारण यह कदम उठाया जाना आवश्‍यक था. वैसे भी जागरूकता और जन स्‍वास्‍थ्‍य आंदोलन ही ऐसे उपकरण हैं, जिनसे एड्स के प्रसार को रोका जा सकता है.

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