opendra
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प्रकाशन तिथि: जनवरी 14, 2008
थमी नहीं है नुक्कड़ से उठी आवाज
Jan 14, 04:26 pm
नई दिल्ली <वंदना गुप्ता>। किसी कालेज के बाहर या बीच बाजार अचानक ढोलक या नगाड़े की थाप पड़ती है। फिर व्यवस्था विरोधी कोई नारा बुलंद होता है या कोई गीत खून की गर्मी बढ़ा देता है। आप भी खिंचे चले आते हैं, इन आवाजों की ओर। वहां दिखते हैं कुर्ताधारी चंद युवा, जिनका जोश देखकर लगता है कि इनकलाब आकर ही मानेगा।
जिसने एक बार भी नुक्कड़ नाटक देखा हो, वह उम्र भर उसे भुला नहीं सकता। और जिसने यह नाटक किया हो, उसका नशा तो हर दिन के साथ चढ़ता है। किसी जमाने में नुक्कड़ नाटकों की लोकप्रियता ने आम लोगों को एकजुट करने में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि इसे शासक वर्ग के खिलाफ विरोध की आवाज माना गया। लेकिन अब नई पीढ़ी इससे दूर होती जा रही है।
सवाल है कि अब नुक्कड़ नाटकों का भविष्य कैसा है? क्या यह भी कुछ अन्य लोक कलाओं की तरह सिमट जाएगा? यह सवाल दो अन्य कारणों से भी प्रासंगिक हो गया है। पहला कारण है दिल्ली में इन दिनों नाटकों का अखिल भारतीय महोत्सव चल रहा है। दूसरी वजह अधिक चमकदार है। अपनी फिल्म ''हल्ला बोल'' के प्रोमोशन पर निकली विद्या बालन ने दिल्ली की सड़कों पर नुक्कड़ नाटक किए।
बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसे अपनी ''मार्केटिंग स्ट्रेटजी'' के रूप में अपना रही हैं। प्रसिद्ध लेखक असगर वजाहत कहते हैं कि नुक्कड़ नाटक एक विशेष स्थिति में खास उद्देश्य से लिखा व मंचित किया जाता था। उसकी प्रतिबद्धता पीड़ित मानव समाज के प्रति थी, लेकिन आज के दौर में उनका नाम ''प्रचार नाटक'' होना चाहिए। नाटक का मकसद बदल जाने से विषय वस्तु भी बदल जाती है।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर कहते हैं कि बड़ी कंपनियां उत्पादों के प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटकों का प्रयोग कर रही हैं। वह भी मानते हैं कि इन बहुविध रूपों से नुक्कड़ नाटक की असली पहचान कहीं खो गई है।
निशांत नाट्य मंच से जुड़े शम्सुल इस्लाम नुक्कड़ नाटकों के पुराने स्वरूप के पक्ष में हैं। वह सरकार एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा नुक्कड़ नाटकों को गोद लेने के खिलाफ हैं। उनके मुताबिक नुक्कड़ नाटकों का उद्देश्य राजनीति की धार तेज करना है, न कि खाने-पीने एवं मनोरंजन के साधनों का प्रचार करना। फिर भी वह इसके भविष्य के बारे में आश्वस्त हैं।
जन नाट्य मंच की सचिव व सफदर हाशमी की पत्नी मलयश्री हाशमी के अनुसार सफदर कहते थे कि कोई कला अपनी रचनात्मकता के बल पर कामयाब होती है, तो उसे जरूर जिंदा रखना चाहिए, लेकिन उसके विकास के लिए निरंतर प्रयोग भी जरूरी है। वह कहती हैं कि कुछ संस्थाएं अच्छा काम रही हैं, तो कुछ केवल खानापूर्ति।
बदलाव के इस दौर में यह नहीं भूलना चाहिए कि आज नुक्कड़ नाटक का कलाकार रंगमंचीय कलाकार से अधिक कमा रहा है। नुक्कड़ नाट्यकर्मी मोहम्मद शफीक के मुताबिक नुक्कड़ नाटक संघर्षरत कलाकारों को रोजगार देते हैं। देश में 100 से अधिक नाट्य मंच नुक्कड़ नाटकों का सहारा ले रहे हैं। रंगकर्मी सतीश शर्मा भी कहते हैं कि कलाकार की पहली जरूरत रोजी-रोटी है।
इतिहास के झरोखे से
नुक्कड़ नाटक अनपढ़ जनता का साहित्य है। प्राचीन काल में शिकार के बाद होने वाला नाच-गाना भी एक तरह का नुक्कड़ प्रदर्शन ही था। मध्यकाल में भी नुक्कड़ नाटकों से मिलती-जुलती नाट्य शैली का विकास विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं के लोक नाटकों के रूप में हुआ। हम जिन नुक्कड़ नाटकों को जानते हैं, उनका इतिहास स्वाधीनता संग्राम के दौरान कौमी तरानों और विरोध जुलूसों में देखा जा सकता है। यही इप्टा के रूप में सामने आया, जब भारत में अलग-अलग कला माध्यमों के लोग एक साथ आकर मिले और क्रांतिकारी नाटकों के मंचन के जरिये विदेशी शासन का विरोध करने लगे।
माना जा सकता है कि नुक्कड़ नाटकों का जन्म ब्रिटिश शासन के जुल्म के खिलाफ हुआ। बाद में हबीब तनवीर, सफदर हाशमी जैसे प्रतिष्ठित नाट्य कर्मियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। हबीब तनवीर ने 1948 में मुंबई में अपना पहला नुक्कड़ नाटक ''शांतिदूत कामगार'' प्रस्तुत किया था।
कुछ प्रसिद्ध नाटक
सबसे सस्ता गोश्त, लाश पड़ी है, नंगा प्रसाद, मुरलीधर की मुरली, हर वर्दी के नीचे एक किसान, नया अध्यादेश, टुकड़ा नहीं पूरी रोटी लेंगे, सरकारी सांड़, उठ जाग मेरी बहना, बम मारो बम, रेहड़ी पटरी नहीं हटेंगी, हम हैं झुग्गी वाले, काफिला अब चल पड़ा है आदि।