भारत-अमेरिका संबंध
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प्रकाशन तिथि: मार्च 22, 2006
भारत-अमेरिका संबंध
हैनरी टुमैन से लेकर आइजनहॉवर तक और जॉन एफ.कैनेडी, रिचर्ड निक्सन से लेकर बुश सीनियर तक अमेरिका के विभिन्न राष्ट्रपतियों के कार्यकाल के दौरान शीत युद्ध और विश्व राजनीति के ध्रुवीकरण जैसे कुछ कारणों के चलते भारत और अमेरिका के संबंध सदैव प्रतिकूल एवं असौहार्दपूर्ण ही रहे. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, युगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो और मिस्र के गैमल अब्दुल नासिर ने मिलकर निर्गुट आंदोलन आरंभ किया और फिर बैंडंग, इंडोनेशिया में इस आंदोलन को मजबूती प्रदान की. किंतु पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका ने सदैव इस आंदोलन को संदेह की दृष्टि से देखा. एक उदीयमान एशिया के एक परिपक्व नेता के रूप में नेहरू ने आभास किया कि अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ द्वारा स्थापित किए गए प्रतिद्वंदी गुटों से अलग रहकर एशिया और अफ्रीका के विकासशील देशों का एक गुट बनाया जा सकता है. यहां तक कि अमेरिका आज भी यही करता है कि जो देश अंतरराष्ट्रीय मामलों में उसके साथ नहीं चलते, वे उसके विरोधी हैं. आतंकवाद के विरूद्ध जंग का आह्ववान करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू. बुश ने यही तो कहा था, ‘’या तो आप हमारे साथ हैं या विरोध में हैं.’’ और अमेरिका प्रारंभ से ही यह जानता था कि अमेरिकी इशारों पर न नाचने वाले भारत को सबक सिखाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है पाकिस्तान को भारत के विरूद्ध सैन्य मजबूती प्रदान करना.
कश्मीर मुद्दे के साथ-साथ भारत के विरोध में पाकिस्तान को प्रसन्न करने के लिए अमेरिका प्रशासन द्वारा किए गए प्रयासों के कारण नई दिल्ली और वाशिंग्टन के बीच की दरार वर्षो तक बढ़ती रही यद्यपि दोनों देश के नेतृत्व समय-समय पर एक-दूसरे से मित्रता संबंधी औपचारिकताएं निभा देते थे. और फिर 1991 का दौर आया जब शीत युद्ध ठंडा पड़ने लगा. एक ओर श्री गर्वाचोव के कार्यकाल में सोवियत संघ का विघटन हो रहा था तो दूसरी ओर भारत में पी.वी.नरसिंह राव और डॉ. मनमोहन सिंह भारत का आर्थिक उदारीकरण के मार्ग पर प्रशस्त कर रहे थे।
1991 के बाद उपमहाद्वीप में परिवर्तन की हवा बहने लगी और यहां तक कि अमेरिका ने भी आभास किया कि यह इन महाद्वीपों में बहने वाली हवा से लज्जित नहीं हो सकता है. शीत युद्ध जल्द ही भूतकाल में चला गया और अमेरिका निर्विवाद रूप से राजनीतिक, आर्थिक एवं सैन्य स्तर पर एकमात्र महाशक्ति के रूप में स्थापित हो गया. धीरे-धीरे इसे यह भी आभास होने लगा कि दो एशियाई देश- भारत और चीन- भी महाशक्ति बनने के मार्ग पर तेजी से बढ़ रहे हैं.
2000 में राष्ट्रपति पद की शपाथ लेने से पूर्व जार्ज बुश यह भी नहीं जानते थे कि भारत का प्रधानमंत्री कौन है और पाकिस्तान का राष्ट्रपति कौन है. किंतु आज वे भारत और भारत के प्रधानमंत्री के बारे में जितनी जानकारी रखते हैं, उतनी जानकारी तो अमेरिका आभास करने वाले राष्ट्रपति श्री क्लिंटन थे जिन्होंने यह महसूस किया कि आज के तेजी से बदलते वातावरण में अब भारत और पाकिस्तान के साथ एक समान व्यावहार करना और उन्हें एक समान समझना प्रासंगिक नहीं है. 2000 में अमेरिका के नए राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने से कुछ दिन पहले तक श्री जार्ज बुश यह भी नहीं जानते थे कि भारत का प्रके किसी भी पूर्व राष्ट्रपति ने प्राइज़ करने का प्रयास नहीं किया. वे भारत की शाक्तियों और कमजोरियों की जानकारी रखते हैं. वे इन दोनों उभरती महाशक्तियों- भारत और चीन – का पूरा सम्मान करते हैं.
सच क्या है ? भारत अमेरिका के निकट आ रहा है- या अमेरिका भारत के ? दोनों एक-दूसरे के निकट आ रहे हैं. वास्तविकता यह है कि एक-दूसरे के निकट आने में ही दोनों का हित है- एक विश्व का सबसे शाक्तिशाली लोकतंत्र है तो दूसरा सबसे बड़ा भारत के एक लोकप्रिय समाचार चैनल को साक्षात्कार देते हुए ‘न्यूजवीक’ के संपादक ने स्वीकार किया कि भारत की आर्थिक वृद्धि और प्रतिसंतुलन (countrebalance) स्थापित करने की आवश्यकता ने ही श्री बुश पर भारत के निकट आने के निए जार डाला है. किंतु ऐसे कई तथ्य हैं जिन्होंने अमेरिकी सोच को प्रभावित किया है और उनमें से एक कारण है भारत की कुशाग्र श्रमशक्ति का महत्त्व. श्री बुश ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि ऐसे कई भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक हैं जिन्होंने हमारे देश के विकास में अमूल्य योगदान दिया है. आज जिस हाई-टैक प्रौद्योगिक के कारण हमारे समाज के स्वरूप में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है इसका अधिकांश श्रेय भारतीय मूल के अमेरिका वासियों और अमेरिका में शिक्षा प्राइज़ कर चुके भारतीयों को जाता है. अमेरिकी नागरिकों ने भी इन भारतीयों के महान योगदान को एक भिन्न परिप्रेक्ष्य में देखना आरंभ कर दिया है तथा अब उन्हें यह आभास होने लगा है कि इन भारतीयों नेन केवल अमेरिका बल्कि विश्व विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है.
भारत-अमेरिका संबंध आज से पहले कभी इतने उज्ज्वल नहीं रहे और एक-दूसरे के निकट आना दोनों के लिए ही लाभप्रद है. हम अमेरिका की राजनीतिक मंशाओं का समर्थन नहीं कर सकते किंतु आर्थिक एवं प्रौद्योगिक क्षेत्र में उसका हाथ पकड़ कर आगे बढ़ने और उसके निकट आने में हमें कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए. अमेरिका द्वारा किसी न किसी प्रकार से भारत के निकट आने की मंशा से स्पष्ट है कि भारत 21वीं शताब्दी की महाशाक्ति बन रहा है.