अब पिस्तौल से खेलता है बचपन
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प्रकाशन तिथि: मार्च 06, 2006
अब पिस्तौल से खेलता है बचपन
दस वर्षीय स्कूल विधार्थी युवराज भाटिया को अन्य किसी भी खेल से ज्यादा अपनी छर्रे वाली मेड-इन प्लास्टिक की पिस्तौल चलाने में मजा आता हैं। हालांकि इस खिलौने पर साफ शब्दों में चेतावनी लिखी हुई हैं कि इसकी गोलियां किसी सजीव प्राणी पर न दागी जाएं, मगर इस चेतावनी की न तो युवराज को और न ही उसके माता-पिता को परवाह हैं। उसके वकील पिता दीप और आयुर्वेदिक डॉक्टर मां गीता दोनों को ही अपने बेटे को बंदूक चलाते हुए देखने में गर्व महसूस होता हैं। दीप भाटिया कहते हैं, ‘आज की बिगड़ती कानून व्यवस्था के माहौल में आदमी को अपनी सुरक्षा के प्रति सचेत रहना बेहद आवश्यक है और मैं तो यह मानता हूं कि समाज में लोगों को अपनी रक्षा के लिए हथियार रखने की जितनी ज्यादा अनुमति दी जाएगी, अपराध दर उतनी ही धटती जाएगी। भाटिया के पास क्लास-III की एक पिस्तौल हैं।
दिल्ली के 29 वर्षीय अमित सरीन के पास एक स्माइथ एंड रिवाल्वर है जिसे साथ रखकर वे रात को अपनी कार से सुनसान इलाकों से गुजरने में भी सहजता अनुभव करते हैं।
वे कहते हैं कि यह पिस्तौल मेरे पास है तो मुझे कोई डर नहीं हैं। अमित के पास एक नहीं आठ-आठ हथियार हैं जिसके चलते वो लंबी यात्रा के लिए निर्भय होकर निकल सकता है।
आज के बदलते सामाजिक परिवेश में ढले महानगरों में दीप और सरीन जैसे न जाने कितने ही लोग मिल जाएंगे जिनके लिए ये हथियार उनके सुरक्षा-कवच बन चुके हैं। इनमें अधिकतर लोग अपनी सुरक्षा के लिए केवल पुलिस या प्रशासन पर निर्भर नहीं रहना चाहते लेकिन हथियार रखना इन्हें सुरक्षात्मक माहौल का एहसास कराए न कराए मगर इनके समक्ष एक खतरनाक वातावरण पैदा कर देता है।
अकेले दिल्ली में 58,000 लाइसेंसशुदा बंदूकधारी हैं जिनमें प्रत्येक तीन हथियार रख सकता है। राइफल, बंदूक और पिस्तौल या रिवाल्वर। हर वर्ष इन बंदूकधारियो की फेहरिस्त में 1400 से 1600 लोगों का इज़ाफा होता है। इन बंदूकधारियों में व्यापारी, और सरकारी कर्मचारी तक होते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह हैं कि उड़ीसा जैसे अपेक्षाकृत-शांत इलाके में भी इस सूची में 700 लोगों की बढ़ोतरी हुई जबकि अपनी गैंगवारों के लिए कुख्यात मुंबई जैसे महानगर में गत वर्ष केवल 51 लोगों को ही लाइसेंस दिया गया।
अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर रहने वाले इन लाइसेंसधारियों में एक नाम दिल्ली निवासी तथा पूर्व वन्य अधिकारी जे.एस.शर्मा का भी हैं। उन्होंने अपनी जेक्स बांड वाल्थर पी पी के पिस्तौल बेचकर नई स्मिथ एंड वैसन रिवाल्वर हाल ही में खरीदी हैं। शर्मा को एक बार कोलकता में एक गैंग द्वारा प्रताडि़त किया गया था। शर्मा कहते हैं ‘हालांकि मैंने अपनी बंदूक का अभी तक इस्तेमाल नहीं किया हैं मगर इसके पास रहने से मुझे अब डर नहीं लगता।
दिल्ली के मानव व्यवहार और संबंद्ध विज्ञान संस्थान के मनोचिकित्सक एवं प्रोफेसर श्रीधर शर्मा का कहना है कि ‘जो लोग हथियार खरीदते हैं वे निश्चित रूप से इसकी कीमत वसूलने के बारे में सोचेंगे और इन्हें इस्तेमाल न किए जाने से तो यह कीमत वसूल नहीं हो सकती
दिल्ली के एक व्यापारी ने पिछले दिनों एक वाहन चालक पर सिर्फ इस वजह से गोली चला दी क्योंकि उस चालक ने उसकी टाटा इंडिका पीछे से ठोक दी थी। बजाय इसके कि वो उस चालक को मारता-पीटता या उससे बहस करता, तेजविंदर नाम के इस व्यापारी ने सीधे उस पर गोली चला दी। वो तो ईश्वर की कृपा थी कि चालक संजय कुमार पर ,कि तेजविंदर का निशाना अच्छा नहीं था वरना आज संजय इस दुनिया में नहीं होता। इस महीने कमल कांत जैन नाम के व्यापारी ने अपनी लाइसेंसशुदा रिवाल्वर से एक रेस्तरां के मालिक पर दो गोलियां चलाई। गत वर्ष जसवंत सिंह की दो अज्ञात स्कूटर सवारों ने दिन-दहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी। बंदूक के नजायज प्रयोग का जेसिका लाल हत्याकांड से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि मामले के नौ साल बाद इसके सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया। सांसद फूलन देवी की दिन-दहाड़े की गई नृशंस हत्या ऐसा ही एक उदाहरण है। लखनऊ विश्वविधालय छात्र संध के दयाशंकर अपने साथ हमेशा दो सुरक्षा गार्ड रखते हैं क्योंकि इससे उन्हें सुरक्षित होने का एहसास होने के साथ-साथ प्रतिष्ठा भी मिलती है।
ऐसा नहीं है कि लाइसेंसशुदा हथियारों का उपयोग या दुरूपयोग उन्हें अपने पास रखने वाले लोग ही करते हैं। ये हथियार कभी-कभी उनके पारिवारिक सदस्यों के लिए भी प्राणधातक सिंद्ध होते है।
18वर्षीय स्कूली छात्रा अर्चना झा परीक्षा परिणामों में निराशाजनक प्रदर्शन के कारण हताश तो थी मगर जब उससे अपने परिवार और स्कूल के संगी-साथियों का उपेक्षापूर्ण रवैया बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने अपने पिता के कमरे के दराज से उनकी लाइसेंसशुदा पिस्तौल निकालकर खुद को गोली मार ली।
वे बताते हैं कि एक छोटी एस एंड डब्ल्यू बंदूक अमेरिका में 21,000 से 32,000 रूपये में मिल जाती हैं, जबकि भारत में यही बंदूक 2 से तीन लाख रूपये में बेची जाती हैं। खैर, स्थिति चाहे जो भी हो मगर सच्चाई यह हैं कि बिगड़ती कानून व्यवस्था और सामाजिक परिवेश में लोग बंदूको के साए में जीने को विवश हो रहे हैं जो कि एक सुखद भविष्य का संकेत कतई नहीं हो सकता।