ख़तरे पहचानती है मनुष्य की नाक
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प्रकाशन तिथि: मार्च 30, 2008
एक ताज़ा शोध में वैज्ञानिकों ने पाया है कि अगर आस-पास किसी भी तरह का ख़तरा मंडरा रहा हो तो मनुष्य गंध के ज़रिए उसे भांपने की क्षमता रखता है.
अपने प्रयोग में वैज्ञानिकों ने लोगों को एक ही तरह की दो सुगंधों के बीच अंतर करने को कहा.
पहले तो वो इसमें नाकाम रहे लेकिन जब उन्हें हल्का सा इलेक्ट्रिक शॉक दिया गया तो वे आसानी से गंध को पहचान गए.
बाद में दिमाग के स्कैन से मस्तिष्क के टसूंघने वालेट हिस्से में परिवर्तन की पुष्टि भी हो गई.
अमरीकी शोध ‘साइंस’ जरनल में प्रकाशित हुआ है जिसमें सुझाया गया है कि मनुष्य के पूर्वजों ने ये काबिलियत विकसित की थी ताकि ख़तरों से दूर रह सकें.
ख़तरों को सूंघने की क्षमता
शोध के दौरान 12 लोगों को दो घास जैसी दुर्गंधों को सूंधने को कहा गया. उनमें से कोई भी उसे ठीक से नहीं पहचान सका.
फिर सूंघने के दौरान जब उन्हें बिजली का हल्का सा झटका दिया गया तब वो सुगंधों के बीच अंतर करने में कामयाब रहे.
शिकागो के नार्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के फ़िनबर्ग स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के शोधकर्ता डॉक्टर वेन ली ने कहा, “ ये काबिलियित धीर-धीरे विकसित हुई है. हमारे आस-पास जो सूचनाओं का अंबार है, उसमें से कौन सी जानकारियाँ हमारे ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी है, सूघंने की क्षमता हमें खतरनाक चीज़ों से दूर रहने के लिए आगाह करती है.”
मस्तिष्क की हलचल को जांचने वाले के एमआरआई स्कैन से दिमाग़ के ‘अल्फ़ैक्ट्री कॉस्टेक्स’ हिस्से में झटके के पहले और बाद का फ़र्क साफ़ देखने को मिला.
न्यूकस्टल विश्वविद्यालय के डॉक्टर गेरल्डिन राइट ने जानवरों पर इसी तरह के प्रयोग किए हैं. उन्होंने कहा कि मूलत: मनुष्य का सुगंध तंत्र भी उसी तरह का होता है.
उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य की नाक की संवेदनशीलता दूसरे प्राणियों की तुलना में बहुत कम नहीं है.
“नाक में अल्फ़ैक्ट्री ग्राहियों की संख्या में दूसरे प्राणियों की तुलना करने पर हम काफ़ी अच्छे हैं और हम कई तरह की सुगंधों को पहचान सकते हैं.”