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मोहे रंग दे बसंती

Summary rating: 5 stars 3 समीक्षा
लेखक :
संक्षेपक : garima g
विजिट्स: 655
शब्द: 600
प्रकाशन तिथि: अप्रैल 14, 2006
मोहे रंग दे बसंती. राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने हाल अपनी सुपर डुपर हिट फिल्‍म 'रंग दे बसंती' के माध्‍यम से यही कहने का प्रयास किया है। निश्चित रूप से भारतीय युवाओं के लिए यह फिल्‍म हवा का एक ताजा झोंका बनकर आई है. यह फिल्‍म देश के युवाओं, वर्तमान समय और जोश के बारे में है. किंतु फिर भी सब कुछ बिल्‍कुल वैसा ही है जैसा इतिहास में हो चुका है. कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है. यह सच है. यह फिल्‍म ऐसे युवाओं की कहानी है जो अपने पश्चिमी संस्‍कृति की हर दमक से परिचित हैं फिर भी अपने ढाबों के परांठों और लस्‍सी को प्राथमिकता देते हैं. ये युवक जब तक दिशाहीन होते हैं तब तक अपने राष्‍ट्रीय मूल्‍यों को समझ नहीं पाते हैं. किंतु जब वे अपनी जीवन के लिए एक सही दिशा प्राप्‍त कर लेते हैं तो समझ जाते हैं कि एक आदर्श जीवन और एक आदर्श मौत क्‍या होती है. फिल्‍म की सबसे विशेष बात है इसके व्‍याख्‍यता द्वारा कही गई कुछ पंक्तियां, '' मैंने सोचा था कि इस दुनिया में दो प्रकार के लोग होते हैं, एक वे जो रोते हुए मरते हैं और दूसरे वो जो खामोशी से मौत के मुंह में जाते है. और फिर मैं तीसरी किस्‍म के लोगों से मिला जो हंसते-हंसते मौत को अपने आगोश में ले लेते हैं.
यह फिल्‍म वास्‍तव में निर्देशक का एक बहुत ही साहसिक और प्रवर्त्‍तनकारी प्रयास है जो निश्चित रूप से देश के युवाओं को सही दिशा दिखाता है. फिल्‍म की कहानी आज के युवाओं की मानसिकता को प्रदर्शित करते हुए आरंभ होती है. आज के युवाओं को लगता है कि देशभक्ति अब शायद इतिहास के पन्‍नों में ही मिलती है और आज का विश्‍व इससे कहीं आगे निकल चुका है. वे नाच सकते हैं, गा सकते हैं किंतु देशभक्ति की कुछ पंक्तियां पूरे जज्‍बे के साथ नहीं बोल पाते हैं. फिल्‍म इसी प्रकार से आगे बढ़ती है. भारतीय क्रांतिकारियों पर फिल्‍म बनाने की चाह लेकर आई एक विदेशी युवती को कुछ युवकों के एक समूह में वही जज्‍बा दिखाई देता है जो उसके दादाजी ने भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों में देखा था. ये युवक प्रारंभ में इस देशभक्ति की भावना को समझ नहीं पाते हैं किंतु अपने पायलट दोस्‍त की मृत्‍यु के बाद उन्‍हें एहसास होता है कि इतिहास की भांति अभी भी बहुत कुछ बदलना बाकी है. वे क्रांतिकारियों की भांति एक साहसिक निर्णय लेते हैं, अपने अपराध को स्‍वीकार करते हैं और एक प्रवर्त्‍तनकारी सोच का प्रसार करते हुए अपने जीवन का बलिदान कर देते हैं.
फिल्‍म के नायक दलजीत सिंह अंत में मरते हुए कहता है, ''दुनिया मे जीने के दो तरीके होते है. एक यह कि जो कुछ भी हो रहा है उसे बर्दाश्‍त करते जाओ और दूसरा यह कि आगे बढृकर हालात को बदलो.

एक बहुत ही खूबसूरत फिल्‍म, एक महान संदेश और साथ ही साथ फिल्‍मी मनोरंजन. राकेश ओम प्रकाश मेहरा की यह फिल्‍म न केवल देश के युवाओं के लिए बल्कि उन निर्माता निर्देशकों को भी एक बहुत बड़ा संदेश देती है कि सैक्‍स, हिंसा और फूहड़ता के बिना भी देश के युवाओं के लिए एक बहुत अच्‍छी फिल्‍म बनाई जा सकती है.
मोहे रंग दे बसंती  द्वारा       
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