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इन्कलूसिव फाइनैंस के खतरे

द्वारा : pratima avasthi    

लेखक : स्वामीनाथन एस . अंकलेसरैया अय्यर
इन्कलूसिव फाइनैंस के खतरे
भारत के साथ - साथ आजकल लगभग
सभी लोकतांत्रिक देशों के राजनेता इन्कलूसिव फाइनैंस को लागू करना चाहते हैं। इन्कलूसिव फाइनैंस एक ऐसी व्यवस्था है , जिसमें सभी को लोन दिया जाता है। इसमें गरीब तबके के लोग भी शामिल हैं। वैसे , अगर अमेरिका के मौजूदा आर्थिक संकट को देखा जाए , तो साफ लगता है कि इन्कलूसिव फाइनैंस के इस लक्ष्य को दूर तक ले जाने के अपने खतरे होंगे।
अमेरिका के वर्तमान आर्थिक संकट की शुरुआत एक हाउसिंग बुलबुले के फटने की वजह से हुई। देखा जाए तो यह बुलबुला उन अमेरिकी नीतियों की वजह से पैदा हुआ , जिनके मुताबिक सरकार चाहती थी कि लो इनकम ग्रुप के लोगों समेत हर अमेरिकी के पास अपना घर हो। वहां के राजनेताओं ने हर तबके के लोगों को वित्त जगत की मुख्य धारा से जोड़ने की बाकायदा पैरवी की , जिसके चलते ज्यादा से ज्यादा लोगों ने उधार लिया। यहां तक कि कमजोर और लो इनकम ग्रुप के लोगों तक भी उधार का पैसा पहुंचा और यही चीज इतने बड़े आर्थिक संकट की वजह बनी। कहना न होगा कि इससे भारत को भी सीख लेने की जरूरत है।
लीमन ब्रदर्स और मेरिल लिंच जैसे वॉल स्ट्रीट इन्वेस्टमंट बैंक बुलबुले को बढ़ाने के लिए भले ही हंसी के पात्र बने हों , लेकिन सच यही है कि इस बुलबुले के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं। इस बुलबुले के लिए अगर कोई जिम्मेदार है , तो वह हैं राजनेता और सरकारी संस्थाएं , जो इन्कलूसिव फाइनैंस की वकालत कर रही थीं।
हालांकि फैनी मे और फ्रेडी मैक जैसी इन फर्म्स के प्राइवेट शेयरहोल्डर थे , फिर भी उनके पास सरकारी गारंटी थी। ऐसे में अपने प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले उन्हें कम दरों पर उधार मिल जाता था। इस सब्सिडी को यह कहकर जस्टिफाई किया गया कि सरकार सभी के लिए होम लोन की कॉस्ट घटा रही है। इन संस्थाओं ने पूरे बैंकिंग सिस्टम द्वारा ओरिजिनेट किए गए मॉर्गिज को खरीद लिया। इससे बैंकों का खतरा कम हो गया , जिसकी बदौलत उन्होंने होम लोन को खुले दिल से बांटना शुरू कर दिया।
अब फैनी और फ्रेडी को हाउसिंग मार्किट पर पैनी नजर रखनी चाहिए थी। उन्हें समझना चाहिए था कि अगर बुलबुला फट गया , तो उनके पास मौजूद कई मॉर्गिज बेकार हो जाएंगे , लेकिन यह सब समझने की बजाय दोनों कंपनियों ने बुलबुले को बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। तमाम एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी कि एक न एक दिन यह बुलबुला फूटेगा , लेकिन राजनेताओं पर इन चेतावनियों का कोई असर न हुआ। उलटे उन्होंने हाउसिंग फाइनैंस बूम को सेलिब्रेट करना शुरू कर दिया।
इसके बाद बारी आई फाइनैंशल इनोवेशन यानी सिक्युरिटाइजेशन की। मॉर्गिज को रखने की बजाय बैंकों ने वॉल स्ट्रीट फर्म्स को बेच दिया। सिक्युरिटाइजेशन जैसे - जैसे तेजी से बढ़ा , गरीबों को ज्यादा से ज्यादा सबप्राइम लोन देने के लिए बैंकों ने अपने उधार देने की कंडीशन को नरम बना दिया। यहां तक कि लोन देने से पहले उनकी उधार वापस करने की क्षमता और उनकी इनकम को भी नजरंदाज कर दिया गया।
सवाल है कि आखिर बैंकों ने ऐसे खतरे क्यों मोल लिए ? शायद इसलिए कि जो भी खतरा था , उन इन्वेस्टर्स की तरफ ट्रांसफर हो जाता है , जिन्होंने लोन और मॉर्गिज बैक्ड सिक्युरिटीज को खरीदा। इसमें फैनी और फ्रेडी भी शामिल हैं। जब घरों की कीमतें बढ़ती थीं , तो उन्हें अच्छा फायदा मिलता था और जब कीमतें गिरीं , तो उन्हें दिवालिया भी बना दिया। सरकार को उन्हें टेक ओवर करना पड़ा।
एलन ग्रीनस्पैन जैसे एक्सपर्ट्स ने फेनी और फ्रेडी में इतनी बड़ी आर्थिक ताकत को मामूली लगाम के साथ केंद्रित करने के खतरों के बारे में पहले ही आगाह किया था। तमाम सुधारक चाहते थे कि उन्हें छोटी - छोटी इकाइयों में बांट दिया जाए , ताकि उन पर कड़ी नजर रखी जा सके। लेकिन फेनी और फ्रेडी ने लॉबींग की मदद से सुधारकों के पॉइंट्स को कमजोर कर दिया। फेनी और फ्रेडी की पलिटिकल ऐक्शन कमिटी और कर्मचारियों के कैंपेन फाइनैंस के सबसे बड़े रिसिपिएंट में बराक ओबामा ( 125000 डॉलर ), हिलेरी क्लिंटन 75000 डॉलर ) और सेनेट बैंकिंग कमिटी चेयरमैन डॉड ( 165000 डॉलर से ज्यादा ) शामिल थे।
स्ट्रैटिजी काम कर गई। फेनी और फ्रेडी पर कोई असर नहीं हुआ , तब भी जब उन्होंने सरे आम सबप्राइम मॉर्गिज खरीदा और बुलबुले को बढ़ा दिया। तमाम राजनेताओं ने जरूरतमंदों के लिए सबप्राइम मॉर्गिज को उपयोगी लोंस के रूप में सपोर्ट किया , लेकिन इसके परिणाम क्या हो सकते हैं , यह उन्हें महसूस ही नहीं हुआ। सबप्राइम मॉर्गिज कुल मॉर्गिज का 6.8 प्रतिशत है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि समाज के हर तबके को वित्त जगत की मुख्य धारा से जोड़ना ठीक तो है , लेकिन यह छोटी - छोटी डोज में ही होना चाहिए। अगर इसे बड़े पैमाने पर लागू कर दिया जाए , तो इससे बड़े खतरे पैदा हो सकते हैं। जहां तक भारत की बात है , तो भारत अभी फाइनैंशल इन्क्लूजन की शुरुआती स्टेज में है , लेकिन जैसे - जैसे यह बढ़ेगा , गरीबों को सस्ते लोन देने के लिए राजनीतिक दबाव बढ़ना शुरू हो जाएगा। अमेरिका के आर्थिक संकट से हम यही सीख सकते हैं कि बड़े स्केल पर इन्क्लूसिव लोन की व्यवस्था पूरी की पूरी आर्थिक व्यवस्था को डुबो सकती है।
ऐसे में गरीबों और जरूरतमंदों को सहायता दी जानी चाहिए , लोन नहीं , क्योंकि वे लोन की री पेमेंट नहीं कर पाएंगे या फिर अगर करना चाहेंगे , तो राजनेता उन्हें ऐसा न करने के लिए उत्साहित करेंगे। 1980 में भारत के पहले इन्क्लूसिव लोन प्रोग्राम आईआरडीपी की नाकामयाबी से हमें पहले ही इसकी चेतावनी मिल चुकी है। 
प्रकाशन तिथि: अक्तूबर 01, 2008
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