आज की वास्तविकता यह है कि दुनिया में भुखमरी बढ़ती जा रही है। कुछ समय पहले तक दुनिया में 85 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार थे। आज
वह संख्या लगभग 100 करोड़ तक पहुंच रही है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) के अनुसार दुनिया में पिछले एक ही वर्ष में 4 करोड़ लोग भुखमरी की ओर धकेल दिये गये। संगठन का यह भी कहना है कि वर्तमान वित्तीय आर्थिक संकट के चलते कहीं ज्यादा ओर भुखमरी का शिकार हो जायेंगे। आज की भुखमरी की समस्या का प्रमुख कारण है, बढ़ती खाद्य पदार्थों की कीमतें। भारत में ही देखिए, पिछले तीन वषो± गेंहू के आटे की कीमत 8-9 रूपये से बढ़कर 18-19 रूपये किलो हो गयी है। इसका सीधा-सीधा परिणाम है कि गरीब पहले जितने खर्च में आधे से भी कम अनाज को खरीद पाता है। यानि पहले जैसे-तैसे किसी का पेट पूरा भरता था आज वो आधे से भी कम भरता है। वैश्विक स्तर पर खाद्य पदाथो± की कीमतों का बढ़ना खाद्य पदाथो± के मांग और पूर्ति के बीच बढ़ते असंतुलन के कारण है।
अमेरिका में खाद्यान्नों का उपयोग इ±धन निकालने के लिए तेजी से बढ़ता जा रहा है। जहां 2004 में 340 लाख टन मक्के का उपयोग एथनोल निकालने के लिए किया जाता था वहीं अब 813 लाख टन मक्के का उपयोग एथनोल निकालने के लिए किया जा रहा है। इस काम में ब्राजील भी पीछे नहीं है। अमेरिकी सरकार बायो इ±धनों का बढ़ावा देने के लिए हर वर्ष 6 अरब डॉलर की सिब्सडी दे रही है।
दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत जैसे देश में जहां खाद्यान्न उत्पादन और खाद्यान्न उपलब्धता अपने आप में एक भयानक समस्या है और हमारे 22 करोड़ से भी ज्यादा लोग भुखमरी का शिकार हो रहे है, भारत में भी सरकारी नीति द्वारा बायो इ±धन के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। हालांकि सरकार का कहना कि बायो इ±धन के उत्पादन बढ़ने से खाद्य सुरक्षा पर कोई प्रभाव नहीं होगा, वास्तविक धरातल पर सिद्ध नहीं होता है। यह बात ठीक है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों की भांति खाद्यान्नों को बायो इ±धन बनाने के लिए उपयोग नहीं किया जाता है लेकिन जिस प्रकार से सरकार बायो इ±धन के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ऊंचे सर्मथन मूल्य दे रही है, किसान धीरे-धीरे खाद्यान्न उत्पादन त्यागकर जेटरोफा जैसे बायो इ±धन उत्पाद उगाने लग गये हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 2020 तक भारत में खाद्यान्नों की मांग 2570 लाख टन बढ़ जायेगी जबकि भारत का खाद्यान्न उत्पादन 2180 लाख टन ही सिमट जायेगा यानि खाद्यान्नों के उत्पादन के बढ़ने की दर उसकी मांग में वृद्धि से कहीं कम होंगे। यानि देश में भुखमरी पहले से ज्यादा भयानक रूप ले लेगी।
लगभग वर्ष 2000 तक हमारा देश खाद्यान्नों की दृष्टि से लगभग आत्मनिर्भर हो चुका था। देश के खाद्यान्न भण्डार किसी भी आपदा का सामना करने के लिए समक्ष थे। शेष विश्व में भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। वर्ष 2007 तक विकासशील देशों द्वारा 1030 लाख टन खाद्यान्नों का आयात होता था। यह 20 वषो± में बढ़कर 2650 लाख टन तक हो जायेगा, और अमेरिका यूरोपीय देश कनाड़ा, आस्ट्रेलिया और अर्जेटीना बढ़े निर्यातक देश होंगे। विश्व खाद्य कार्यक्रम का यह भी कहना है कि 2030 तक विकासशील देश अपनी जरूरत का 14 प्रतिशत खाद्यान्न विकसित देशों से आयात कर रहे होंगे।
स्पष्ट है कि दुनिया में खाद्यान्नों की कमी होने जा रही है। भारत में स्थिति यह है कि पिछले कई वषो± से हम लगातार खाद्यान्नों के आयात पर निर्भर होते जा रहे है। वर्ष 2007 में ही हमने 50 लाख टन गेहूं का आयात किया। पिछले कई वषो± से सरकार खाद्यान्नों की पार्याप्त खरीद नहीं कर रही थी, जिसके कारण हमारा खाद्यान्न भण्डार लगातार सिमटता जा रहा था। उधर निजी कंपनीयों द्वारा खाद्यान्नों की जमाखोरी के चलते देश में खाद्यान्नों की कीमते बढ़ती जा रही थी। वर्ष 2008 से सरकार द्वारा गेंहू और चावल की अच्छी खरीद के चलते आज खाद्यान्नों की कीमतों पर कुछ विराम लगा है। लेकिन जरूरत इस बात की है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खाद्यान्नों की कमी की भयंकर स्थिति को देखते हुए सरकार जिम्मेदारी पूर्वक व्यवहार करते हुए कृषि की अनदेखी को समाप्त करे। कृषि के लिए पर्याप्त ढ़ाचागत सुविधा जैसे- बिजली, सड़क और सिंचाई की सुविधा तो प्रदान की ही जायें, साथ ही किसानों को अधिक अन्न उपजाने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु लाभकारी मूल्य भी प्रदान करे। सरकार यदि किसान को गेंहू का मूल्य 1200-1300 रूपये कुन्तल सुनिश्चित करती है तो संभव है कि वैश्विक स्तर पर खाद्यान्नों की कमी के बावजूद भारत खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर पायेगा।
लेकिन अमीर मुल्कों के ज्यादा लाभ कमाने के लालच के कारण वैश्विक स्तर पर खाद्यान्नों का उत्पादन निश्चित तौर पर घटने वाला है। ऐसे में यदि भारत की सरकार द्वारा किसानों की सुरक्षा और इस प्रकार खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाये तो शायद हम अपने देश से भुखमरी समाप्त कर पायेंगे। साथ ही साथ यह भी जरूरी है कि सरकार बायो इ±धन बनाने के लालच में किसानों को सिब्सडी देने और ऊंचा समर्थन मूल्य देने से बाज आये। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो भारत के पास कोई नैतिक अधिकार नहीं होगा कि वह अमेरिका द्वारा बायो इ±धन को बढ़ाने के लिए खाद्य़ान्न उत्पादन घटाने की अथवा खाद्यान्नों से बायो इ±धन निकालने की नीति पर कोई प्रश्न खड़ा कर सके।