बे्रटेन वुड समझौतो के फलस्वरूप 1947 में बने `गैट´ (टैरिफ और व्यापार पर आम समझौता) को 1995 में एक नया रूप दे दिया गया और एक
ऐसी नयी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का जन्म हुआ, जिसमें होने वाले समझौते सदस्य देशों के लिए बाध्यकारी बन गये और उन समझौतो का पालन न होने की स्थिति में सदस्य देशों पर कानूनी तौर पर कार्यवाही करने की व्यवस्था की गई। साथ ही साथ नई व्यवस्था में `गैट´ में पूर्व से शामिल मुद्दो में पेटेंट, कृषि, निवेश, सेवाऐं इत्यादि विषय जोड़ दिये गए।
हालांकि भारत और अन्य सदस्य देशों में विश्व व्यापार संगठन के नुकसानों के बारे में जन चेतना बढ़ रही थी लेकिन शुरू में पहले दो सम्मेलनों, सिंगापुर (1996) और जिनेवा (1998) में बड़ी आसानी से निर्णय हो गये। तीसरे मंत्री स्तरीय सम्मेलन से विश्व व्यापार संगठन के खिलाफ आवाज मुखर होने लगी और सिएटल के तीसरे मंत्री स्तरीय सम्मेलन के शुरू होते ही विरोध प्रदर्शनो ने हिंसक रूप ले लिया और सिएटल सम्मेलन को रद्द करना पड़ापांचवां मंत्री स्तरीय सम्मेलन कानकुन (मैक्सीको) में हुआ। कानकुन सम्मेलन बिना किसी नतीजे पर पहुंचे समाप्त हो गया। विश्व व्यापार संगठन की वार्ताऐ लगभग मृत प्राय हो गई और हॉगकांग में सम्पन्न छठा मंत्री स्तरीय सम्मेलन भी बिना किसी ठोस नतीजे पर पहुंचे समाप्त हो गया। वैसे तो हर दो साल बाद विश्व व्यापार संगठन में मंत्री स्तरीय सम्मेलन होने का प्रावधान है लेकिन वार्ताओं के गतिरोध के चलते 2005 के हॉगकांग सम्मेलन के बाद कोई मंत्री स्तरीय सम्मेलन नहीं हो सका। हालांकि इस बीच में छोटे सम्मेलन अवश्य हुए लेकिन वार्ताओं मेें गतिरोध जारी रहा।
क्या है गतिरोध का कारण
विकसित देशों के दबाव के चलते विकासशील देशों के पेटेंट कानूनों को बदल दिया गया। लेकिन साथ ही विकसित देशों ने यह वादा किया कि वे कृषि को दी जाने वाली अपनी सिब्सडी को घटायेंगे और विकासशील देशों के कृषि उत्पादों विकसीत देशों में बेचा जा सकेगा। लेकिन उसके बाद का अनुभव यह बताता है कि मुक्त व्यापार और तथाकथित नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का इसका एजेंडा वास्तव में बहुराष्ट्रीय दवा निर्माता कंपनियों और कृषि व्यापार कंपनियों के ही हितों की पूर्ति करता है। व्यापार संबंधित बौद्धिक संपदा समझौते (ट्रिप्स) का कार्यान्वन गरीब लोगों के जनस्वास्थ्य की कीमत पर हो रहा है। विश्व व्यापार संगठन ने दवा निर्माता कंपनियों के लाभों को तो संरक्षित किया है लेकिन साथ ही साथ सरकारों से अपने-अपने देश में जनस्वास्थ्य की रक्षा का अधिकार छीन लिया गया हैं और लाखों लोग बिन दवाई के दम तोड़ने पर विवश हो रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ है कि अब विकासशील देशों की दवा कंपनियां नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था के कारण सस्ती `जेनेरिक´ दवाएं नहीं बना सकती।
दूसरी ओर विकसित देशों ने अपनी कृषि को दी जाने वाली सिब्सडी को घटाने की बजाए, चार गुणा बढ़ा दिया। अकेले अमेरिका ही अपनी कृषि को 300 अरब डालर की सिब्सडी देता है। विश्व व्यापार संगठन के नियमों को धत्ता दिखाते हुए इन देशों ने अपनी तीन चाथाई से भी अधिक सिब्सडी को ग्रीन बॉक्स में डाल दिया है, जिसे कम करने की उन्हें कोई बाध्यता नहीं होगी। भारत समेत सभी विकासशील देशों में कृषि की बदहाली का मुख्य कारण विश्व व्यापार संगठन ही है। भारी सिब्सडी के चलते सस्ते कपास के आयात के कारण हमारा कपास उगाने वाला किसान अपनी उपज का सही मुल्य प्राप्त नहीं कर पाता और आत्महत्या करने को विवश है। उसी प्रकार दालों और तिलहन का उत्पादन भी कम होता है क्योंकि सस्ते खाद्य तेल आयात हो रहें है। गेहूँ और चावल के जरूरत से कम उत्पादन के फलस्वरूप प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता कम हो रही है। पहले से ही देश में व्याप्त भुखमरी की समस्या और विकट हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) के अनुसार दुनिया में 100 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं, और उस में से 22 करोड़ लोग भारत से हैं। संगठन का यह भी कहना है कि पिछले कुछ वषोZ में 16 करोड़ लोग भुखमरी की ओर ढकेल दिए गये।
ऐसे अहितकारी विश्व व्यापार संगठन, जिससे दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी वाले विकासशील देश नकारने की मुद्रा मे है, भारत सरकार न जाने क्यों विश्व व्यापार संगठन की रूकी हुई वार्ताओं को पुन: शुरू करने की पुरजोर कोशिश कर रही है यह कोशिश सही कही जा सकती है यदि विकसित देश विकासशील देशों की मांगो को मानने के लिए तैयार हों। लेकिन विकसित देश अपनी कृषि सिब्सडी को तो घटाना चाहते ही नही, बल्कि उनकी यह मांग है कि भारत सरीखे विकासशील देश अधिकतर कृषि वस्तुओं पर आयात शुल्क शुन्य कर दें और अपने कृषि उत्पादों के संरक्षण का उनका अधिकार ही समाप्त हो जाए। और इस प्रकार विकसित देशों के कृषि उत्पादों को विकासशील देशों का बाजार मिल जाए। यही नही उनका यह भी कहना है कि गैर कृषि वस्तुओं पर भी विकासशील देश अपने आयात शुल्क घटा दें, जबकि विकसित देशों को अपने आयात शुल्क घटाने की कम बाध्यता हो। ऐसी सभी बातों को 3,4 सितम्बर 2009 को हो रहे लघु मंत्री सम्मेलन (दिल्ली) के एजेन्डा में शामिल किया गया है। वास्तव में यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत सरकार अपने ही पूर्व के संकल्प के विपरीत इस एजेन्डा को स्वीकार करने की मुद्रा में है। सरकार को चाहिए कि अपनी कृषि के बचाव के लिए अपने पूर्व के संकल्प के अनुरूप ही व्यापार वार्ताओं में व्यवहार करें और साथ ही गैर कृषि वस्तुओं के सम्बंध में प्रस्तावित ´नामा´ प्रस्तावों को सिरे से नकार दे। ऐसे तभी देश की कृषि लघु उद्योग और रोजगार की रक्षा हो सकेगी।