कुछ दिन पहले ही जब यह उजागर हुआ कि देश में करैंसी छापने हेतु गुप्त विशेषताओं को लीक किया गया है और इस मामले की छानबीन का
जिम्मा सी.बी.आई. को सौंपा गया है तो पूरा देश सकते में आ गया। किसी भी देश की करैंसी वास्तव में उस पर जनता के विश्वास पर आधारित होती है। करैंसी की सत्यता पर विश्वास ही उसके चलन का आधार है। करैंसी की सत्यता जांचने के लिए बैंक और बड़े प्रतिष्ठान आमतौर पर एक जांच मशीन का उपयोग करते हैं। गुप्त विशेषताओं के आधार पर ही वास्तविक करैंसी की प्रमाणिकता जांची जाती है। ऐसे में उसकी सत्यता दर्शाने वाली विशेषताओं का ही यदि नकली नोट बनाने वालों को पता चल जाए तो उसकी सत्यता के बारे में जानना असंभव हो जायेगा।
हालांकि नकली करैंसी का चलन प्रारंभ से ही होता रहा है लेकिन आज जिस प्रकार से आधुनिक प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से इसे बड़े पैमाने पर अत्यंत संगठित तरीके से नकली करैंसी का फैलाव बढ़ाया जा रहा है, यह गंभीर चिंता का विषय है। पाकिस्तान में मुजफ्फराबाद से लेकर दुबई, बैंकॉक, सिंगापुर और पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, श्रीलंका और बंगलादेश की भूमि का उपयोग इस काम के लिये किया जा रहा है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. इस पूरे काम का समन्वय करती है।
पिछले 2 वषोZ में भारत के लगभग सभी प्रान्तों में नकली करैंसी बड़ी मात्रा में पाये जाने से इस समस्या की विकरालता स्पष्ट होती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश मेें नकली करैंसी की मात्रा एक लाख करोड़ रूपये तक पहुंच चुकी है। रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में जनता के पास करैंसी की कुल मात्रा 6 लाख 80 हजार करोड़ रूपये के लगभग है। आज देश में रिजर्व बैंक के अतिरिक्त कोई ऐसी एजेंसी नहीं है, जो नकली करैंसी की मात्रा का अनुमान दे सके। लेकिन रिजर्व बैंक इसका सही-सही अनुमान उपलब्ध नहीं करा रहा।
रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 में 100 रूपये के नकली नोंटों की संख्या में 60 प्रतिशत की कमी हुई है। जबकि 500 और 1000 रूपये के नकली नोटों की मात्रा में क्रमश: 75 और 300 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। सरकारी आंकड़े स्वभाविक रूप से केवल उसी संख्या को दर्शा सकते हैं जो पुलिस रिकार्ड में दर्ज होते हैं। वर्तमान नियमों के अनुसार नकली करैंसी की पहचान होने पर उसे जब्त करना होता है। जब्त बैंक नोट की मुहर लगाकर उन्हें स्थानीय पुलिस स्टेशन में जमा कर उसकी एफ.आई.आर. दर्ज करवानी होती है। पुलिस को इन नोटों को नासिक स्थित सरकार की सेक्युरिटी पे्रस में भेजना होता है जहां इसकी प्रमाणिकता की जांच होती है। लेकिन यह यदा कदा ही होता है और सामान्यत: निजी बैंक तो नोटों पर मुहर लगाकर ग्राहक को ही वापिस दे देते हैं। इस प्रकार नकली नोटों की विकरालता सरकारी आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो पाती। नैशनल क्राईम ब्रांच ब्यूरों के अनुसार वर्ष 2007 में नकली नोंटों को जब्त करने के 2204 मामले दर्ज हुये और 10 करोड़ रूपये की नकली करैंसी जब्त की गई।
पूर्व में पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए बड़े पैमाने पर नकली करैंसी का सहारा लिया जाता रहा है और नकली नोटों का बाजार आतंकवादियों के स्थानीय सम्पकोZ के माध्यम से बढ़ता ही रहा है। लेकिन इससे आगे बढ़ते हुये शत्रु देशों द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर बनाने हेतु नकली करैंसी को बड़े पैमाने पर हथियार बनाया जा रहा है।
समन्वय का अभाव
कुछ दिन पूर्व करैंसी नोटों की गुप्त विशेषताओं के लीक होने के बाद हालांकि मामला सी.बी.आई. को सौंपने से इस दिशा में हलचल अवश्य हुई है लेकिन नकली करैंसी की विकराल समस्या के बावजूद संबंधित विभागों में संवेदनशीतला की कमी अवश्य दिखाई देती है। नकली करैंसी के मामले में वास्तव में 4 संबंधित विभाग है सी.बी.आई., राजस्व इंटेलिजेंस निदेशालय, केन्द्रीय आर्थिक इंटेलिजेंस ब्यूरो और एनफोर्समेंट निदेशालय।
हालांकि आई.बी. एवं अन्य विभागों द्वारा इस विषय में दिल दहलाने वाली रपटें दी गई हैं, लेकिन केन्द्रीय स्तर पर समिन्वत कार्यवाही दिखाई नहीं देती है। सेना इंटेलिजैंस द्वारा भी इस मामले की विकरालता और गंभीरता बताई गई हैं।
विकट आर्थिक खतरे
नकली करैंसी संबंधित विषय केवल कानून व्यवस्था अथवा आतंकवाद से ही संबंधित नहीं हैं। यह देश के संपूर्ण आर्थिक ताने बाने पर को छिन्नभिन्न करने की क्षमता रखती है। हम जानते हैं कि करैंसी छापने का अधिकार केवल रिजर्व बैंक का ही हैं। देश में कल्याणकारी राज्य का दायित्व निभाते हुये, सरकार अपने खर्च के एक महत्वपूर्ण भाग की पूर्ति रिजर्व बैंक से उधार लेकर करती है और रिजर्व बैंक इसके लिये अतिरिक्त नोट छापता है। हालांकि इस कारण से देश में मुद्रा स्फीति फैलती है, फिर भी कल्याणकारी खर्च को पूरा करने हेतू यह औचित्यपूर्ण भी है। यानि करैंसी छाप कर सरकार अपने आवश्यक खर्च निपटाती है।
लेकिन यदि अपराधी, शत्रु देश और आतंकवादी संगठन नकली करैंसी छाप कर देश में उसका चलन कर देते हैं तो न केवल क्रयशक्ति गलत हाथों में चली जाती है, बल्कि देश में भारी मुद्रा स्फीति भी फैल सकती है और हमारी मुद्रा की क्रयशक्ति कम हो जाती है और मुद्रा का अवमूल्यन हो जाता है।
किसी भी हालत में नकली करैंसी के इस कहर से निजात पाना अति आवश्यक है। सरकार को चाहिये कि इस काम को युद्ध स्तर पर लेते हुये, इस काम के लिये एक केन्द्रीय प्राधिकरण बनाकर अपनी तमाम एजेंसियों को इसका काम के लिए झौंक दें। भारत की खुफिया एजेंसियां इस काम के लिये सक्षम हैं, जरूरत है तो केवल सरकार की इच्छा शक्ति की।