छंट रहे हैं मंदी के बादल
देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने वर्ष 2008-09 की अंतिम तिमाही की अपनी निवल आय में
पिछले वर्ष की तुलना में 274 करोड़ रुपये वृद्धि दिखाई है। बैंक द्वारा इस वर्ष 2008-2009 में 9121 करोड़ रुपये का लाभ कमाया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 2392 करोड़ रुपये अधिक था। यानी 35 प्रतिशत की वृद्धि। ध्यातव्य है कि स्टेट बैंक देश का सबसे बड़ा बैंक और देश के कुल जमा और उधार का एक चौथाई व्यवसाय इस बैंक द्वारा होता है। इन नतीजों के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि ये नतीजे विश्व व्याप्त मंदी के दौरान आये हैं। मंदी के संदर्भ में स्टेट बैंक के अध्यक्ष का कहना है कि कुछ समय मंदी के प्रभाव के बाद आटो और घरों के लिये ऋणों की मांग फिर से बढ़ने लगी है। रिजर्व बैंक के प्रयासों से हो रही तरलता में वृद्धि और तदनुसार ब्याज दरों में कमी का भी बैंकों की ऋण प्रदान करने की क्षमता पर अनुकूल असर हो रहा है।
अमरीका और यूरोपीय देशों में व्याप्त मंदी के दौर के चलते भारत में आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ना शुरु हो गया था। देश में आटो मोबाइल क्षेत्र, रियल इस्टेट क्षेत्र और यहां तक कि दीघZकालीन उपयोग की उपभोक्ता वस्तुओं की मांग प्रभावित हो रही थी। उधर निर्यातों पर भी प्रतिकूल असर देखने में आया। निर्यातों में विशेषतौर पर बी.पी.ओ., साफ्टवेयर के निर्यातों के अतिरिक्त हस्तशिल्प के निर्यात पर भी प्रभावित हुये। नौकरियों में इस कारण की जा रही कटौती ने स्थिति और विकट बना दी। ऐसे में ऐसा लगने लगा था कि भारत में भी अमरीकी मंदी जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
लेकिन यदि ध्यान से देखें तो भारत, अमरीका एवं यूरोपीय देशों से सर्वथा भिन्न अर्थव्यवस्था है। यही नहीं भारत चीन से भी भिन्न अर्थव्यवस्था है। चीन निर्यात पर आधारित अर्थव्यवस्था है, जबकि भारत में अधिकांशत: मांग घरेलू क्षेत्र से आती है। अमरीका और यूरोप के देशों में मांग बैंकों के उधार पर निर्भर करती है। घरों की खरीद, मात्र बैंकों द्वारा दी गई उधार पर निर्भर करती है, अन्य उपभोक्ता वस्तुएं बैंकों से प्रत्यक्ष उधार अथवा क्रेडिट कार्ड के आधार पर ऋण लेकर ही खरीदी जाती है और किश्तों में उसे लौटाया जाता है। भारत में सामान्यत: घर हों, कार हो अथवा अन्य उपभोक्ता वस्तुयें, बैंकों से ऋण लेकर तथा स्वयं की बचत दोनों प्रकार से खरीदे जाते हैं। अमरीका में जब बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों ने अपनी हैसियत और उधार लेने वालों की हैसियत से भी ज्यादा ऋण देने प्रारंभ कर दिये तो उनकी आर्थिक स्थिति डगमगा गई और वे दिवालिया होने लगे। उधर अमरीकी अर्थव्यवस्था में ठहराव और बाद में गिरावट के चलते नौकरियों में कमी के फलस्वरूप लोग अपने ऋण समय पर नहीं चुका पाये।
अमरीकी और यूरोपीय बैंकों में तरलता की कमी के कारण वे उधार देने में सक्षम नहीं रहे। ऐसे में इन देशों के बैंकों में तरलता में कमी मांग में कमी का सबब बनी। यदि भारत में स्थिति को देखें तो पता चलता है कि पिछले साल भर में बैंकों के पास तरलता की कमी नहीं आई। स्टेट बैंक ने अपने लाभों में 35 प्रतिशत वृद्धि की घोषणा की है। साथ ही साथ अन्य बड़े बैंकों जैसे आंध्र बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, कारपोरेशन बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा सहित कई अन्य बैंकों ने भी अपने लाभों में भारी वृद्धि दर्ज की है।
अधिकतर बैंकों ने अपनी ब्याज दरें भी घटाई हैं। आटो ऋणों पर दस से बारह प्रतिशत ब्याज लिया जा रहा है, जबकि गृह ऋण भी मात्र आठ से दस प्रतिशत ब्याज पर उपलब्ध कराया जा रहा है। कम ब्याज दरों और मजबूत अर्थव्यवस्था के चलते पहले आटो मोबाइल क्षेत्र में मांग बढ़ी और अब घरों की मांग भी बढ़ने लगी है। बैंकों के बढ़ते लाभ इस ओर इंगित करते हैं कि उनके द्वारा अधिक ऋण देकर लाभ कमाया जा रहा है।
देश में गृह निर्माण, ढांचागत निर्माण अर्थात् इंस्फ्रास्ट्रक्चर इत्यादि के फलस्वरूप स्टील अैर सीमेंट की मांग भी एक बार फिर से बढ़ने लगी है। बड़ी कंपनियों ने स्टील की मांग 2 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान लगाया है। सीमेंट की मांग भी बढ़ने लगी है। उधर उपभोक्ता वस्तुओं के बारे में आ रहे परिणाम भी उत्साहजनक हैं।
उधर इन सब बातों से उत्साहित शेयर बाजारों में भी तेजी का रूख बरकरार है। पिछले लगभग डेढ़ माह से थोड़ी बहुत उठापटक के बीच मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक अर्थात् सेनसेक्स भी अपनी 7000 के निचले स्तर से उतर उठता हुआ कई बार 15000 के स्तर को पार कर चुका है।
टाटा मोटर्स ने अपनी नैनो कार के लिये 2 लाख कारों की बुकिंग कर ली। उधर कई आटो कंपनियां नित नये मॉडल लेकर बाजार में उतर रही हैं। रियल इस्टेट क्षेत्र में डी एल एफ ने दिल्ली को अपनी नई परियोजना के लिये ओवर बुकिंग की।
यह बात ठीक है कि साफ्टवेयर कंपनियां पहले जैसी भरती नहीं कर रही हैं। उन्होंने वेतनों में कटौती भी प्रभावी की है लेकिन बड़े स्तर पर छंटनी भी नहीं हुई है। अन्य निर्यातों में भी कमी तो दर्ज हुई है लेकिन अर्थव्यवस्था में उत्साह बरकरार है। उछाल लेता शेयर बाजार बैंकों के बढ़ते लाभ, स्टील, सीमेंट की बढ़ती मांग, आटो क्षेत्र और उपभोक्ता वस्तुओं की मांग के आंकड़े इस बात के लिये आश्वस्त करते हैं कि कुछ समय के लिये आया मंदी का डर अब समाप्त हो रहा है और अर्थव्यवस्था का अपने रास्ते आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।