कृषि की फिर हुई अनदेखी
बजट 2009-10 के प्रस्ताव में वित्त मंत्री ने कुछ महत्वकांक्षी बातें कही है। वित्त मंत्री का कहना
है कि सरकार हर वर्ष 120 लाख रोजगार के अवसर जुटायेगी। उन्होंने यह भी कहा कि आगामी वर्ष में कृषि की विकास दर 4 प्रतिशत रहेगी। पिछले वर्ष बजट में केंद्र सरकार का कुल खर्च 7,50,884 करोड़ रूपये प्रस्तावित किया गया था, जो बाद में बढ़कर 9 लाख करोड़ से अधिक हो गया। लेकिन इस बार वित्त मंत्री ने बजट में यह राशि बढ़ाकर 10,20,838 करोड़ रूपये कर दी है। इस महत्वकांक्षी राशि को अमली जामा पहनाने के लिए वित्तमंत्री ने 4,00,996 करोड़ रूपये का राजकोषीय घाटा दिखाया है। जो कुल जीडीपी का लगभग 7 प्रतिशत है।
लेकिन विडम्बना यह है कि इतने महत्वाकांक्षी बजट के बावजूद वित्त मंत्री यानि सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों जैसे कृषि, लघु उद्यम और सबसे बढ़कर गरीब आम आदमी की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। 10 लाख 20 हजार करोड़ रूपये से भी अधिक के सरकारी खर्च में से कृषि, सिंचाई और ग्रामीण विकास को मात्र 62,837 करोड़ ही मिले है जो कुल खर्चे का मात्र 6 प्रतिशत ही है। ऐसे में वित्त मंत्री किस बूते पर कृषि विकास को 4 प्रतिशत तक लेकर जायेंगे, यह समझ से परे है। आज देश की कृषि एक संकट के दौर से गुजर रही है। हम दालों, तिलहन और अनाज के लिए विदेशों पर निर्भर होते जा रहे हैं। हमारा किसान कृषि में हो रहे नुकसान के कारण या तो कृषि छोड़ रहा है या आत्महत्या कर रहा है। कृषि जो 1970-71 में कुल राष्ट्रीय आय का 45 प्रतिशत से भी अधिक अर्जित करती थी, आज मात्र 18 प्रतिशत पर आ चुकी है। इसका अभिप्राय यह है कि कृषि क्षेत्र में कमायी घटती जा रही है। एक क्षेत्र जो 60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा हो उसकी ऐसी दयनीय हालत के प्रति सरकार की संवेदनहीनता देश के लिए कोई अच्छा संकेत नही है। वित्त मंत्री यदि कृषि विकास हेतु कोई महत्वकांक्षी योजना प्रस्तुत करते तो बेहतर होता।
उधर वित्त मंत्री का यह कहना कि वे प्रतिवर्ष 120 लाख लोगों को रोजगार के अवसर दिलायेंगे, वास्तविकता के धरातल पर ठहरता नहीं है। यह बात ठीक है कि सरकार बजट प्रावधानों के द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत लोगों को त्वरित रोजगार तो दे सकती है लेकिन यह कोई स्थायी व्यवस्था नहीं मानी जा सकती। रोजगार की स्थायी व्यवस्था के लिए ऐसी उत्पादन पद्धति की आवश्यकता होती है जिसमें रोजगार के अवसर स्वयंमेव पैदा हों। ऐसी उत्पादन की पद्धति पिछले दो दशकों से जान बूझकर समाप्त की जा रही है। यदि सरकार रोजगार सृजन के बारे में ईमानदार है तो उसे लघु और कुटीर उद्यमों का सरकारी सहायता से विकास करना होगा और साथ ही साथ उनके विकास में आ रहे अवरोधों को दूर करना होगा। लेकिन यदि आर्थिक समीक्षा (2008-09) कोई संकेत है तो कहा जा सकता है कि सरकार आगे आने कुछ महीनों में ही खुदरा क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए और अधिक खोलने जा रही है ऐसे में बड़ी संख्या में छोटे दुकानदार बेरोजगार हो सकते हैं।
वाजपेयी सरकार के समय 1 करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष पैदा करने के लिए उपाय सुझाने हेतु योजना आयोग के सदस्य एस.पी. गुप्ता की अध्यक्षता में एक कमेटी ने कुछ उपाय सुझाए थे। इसलिए सरकार को यदि 120 लाख लोगों को प्रतिवर्ष रोजगार देने का लक्ष्य प्राप्त करना है तो उसे खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के रास्ते से अलग हटना ही होगा, साथ ही एस.पी. गुप्ता कमेटी की सिफारिशों को भी लागू करना होगा। उस कमेटी ने कहा था कि यदि रोजगार के अवसर बढ़ाने है तो हमें लघु कुटीर उद्यमों के विकास के साथ-साथ खाद्य प्रसंस्करण इत्यादि क्षेत्रों के विकास पर भी ध्यान देना होगा।
यह बात प्रशंसा के योग्य है कि वित्त मंत्री ने सरकारी खर्च को पूरा करने हेतु भारी विनिवेश की जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही थी उन्हें दरकिनार किया है तथा बैंको और बीमा कंपनियों को सरकारी क्षेत्र में ही रखने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। त्वरित रोजगार हेतु राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम के लिए बजट प्रावधानों को भारी रूप से बढ़ाया है जो अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हो सकता है। साथ ही जैविक खादों के विकास हेतु खाद की सिब्सडी योजना में बदलाव के संकेत दिए है। देश में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम बनाने के बारे में आम बहस के भी संकेत दिए है। हथकरघा और पावरलूम क्षेत्र के विकास के लिए कलस्टर विकसित करने की बात भी कही गयी है।
वित्त मंत्री ने यह कहा है कि यदि हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और प्रशिक्षण देने में सफल हो जाएं तो आज भारत की बड़ी जनसंख्या उसके लिए लाभदायक हो सकती है। यह चिंता का विषय है कि पिछले कई वषो± से सामाजिक सेवाओं पर कुल सरकारी खर्च का अनुपात लगातार घटता जा रहा है। 2003-04 में जो अनुपाात लगभग 25 प्रतिशत तक पहुंच गया था, आज यह मात्र 12 प्रतिशत तक आ गया है। शिक्षा और स्वास्थ्य के महत्व को समझने के बावजूद वित्त मंत्री पिछले वित्त वर्ष में कंपनियों को तो 186 हजार करोड़ रूपये के राजकोषीय प्रोत्साहन को तो आसानी से दे देते है लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए प्रावधान लगातार घटाते जा रहे हैं। यह शुभ संकेत नहीं है।
डॉ. अिश्वनी महाजन