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गरीब की रोटी के साथ खिलवाड़

द्वारा : ashwanimahajan    

लेखक : डॉ. अश्विनी महाजन
गरीब की रोटी के साथ खिलवाड़
कुछ समय पूर्व असंगठित क्षेत्र के लिये अजुZन सेन गुप्ता की अध्यक्षता में गठित कमेटी की रपट
में यह कहा गया था कि देश मेें 77 प्रतिशत से भी अधिक लोग 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम में गुजर कर रहे हैं। एक आदमी की न्यूनतम आवश्यकता भोजन, आवास और कपड़े की होती है। आसानी से समझ में आता है कि इतने कम में इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना संभव नहीं होता है।
यानी कह सकते हैं कि देश में 77 प्रतिशत से भी अधिक लोग अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते हैं। लेकिन सरकार द्वारा ऐसे प्रयास लगातार चलते रहते हैं कि यह बताया जाए कि गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। यानी देश में गरीबी घट रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1973-74 में 32 करोड़ यानी 55 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे रहते थे और अब बताया जा रहा है कि 2004 में मात्र 28 प्रतिशत ही लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2007 में गरीबी की रेखा से नीचे का प्रतिशत 22 करोड़ यानी 20 प्रतिशत जनसंख्या ही गरीबी की रेखा से नीचे रह गयी है। वैसे तो यह सरकारी अर्थशास्त्रियों की इच्छा पर निर्भर करता है कि वे गरीबी की क्या परिभाषा अपनायें, लेकिन गरीबी की एक ऐसी परिभाषा अपनाई जानी चाहिये जो गरीब की सही पहचान करने में सहायक हो सके। पिछले कुछ समय से सरकार द्वारा अपनायी जा रही गरीबी की परिभाषा की काफी आलोचना होती रही है।
1973-74 में एक व्यक्ति जो 2400 कैलोरी से कम भोजन पाता है, को गरीब माना जाता था। लेकिन आज की परिभाषा के अनुसार मात्र 1870 कैलोरी से कम प्राप्त करने वाले को ही गरीब माना गया है। यानी मकान, कपड़ा और बिजली जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को तो खरीदने की क्षमता की कोई बात गरीबी की परिभाषा में आती नहीं बल्कि गरीब कहलाने के लिये भोजन की जो शर्त है उसे भी काफी घटा दिया गया है। इसके चलते भिन्न-भिन्न प्रांतों में गरीबी की रेखा के नीचे रखे जाने की आमदनी की शर्त यह है कि यदि कोई व्यक्ति 8 से 9 रुपए प्रतिदिन पाता है तो वह गरीबी की रेखा से ऊपर माना जाएगा। ध्यातव्य है कि यदि 2400 कैलोरी की शर्त भी रखी जाती है तो 75 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा से नीचे मानी जाएगी।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के नाम से सरकार द्वारा एक नया कानून बनाया जा रहा है जिसके अनुसार सरकार गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए खाद्यान्न उपलब्धता सुनिश्चित कर खाद्य सुरक्षा प्रदान करने हेतु बाध्य होगी। लेकिन इसके साथ ही इस प्रस्तावित अधिनियम के विरोध में स्वर उठने लगे हैं। अभी हाल ही में राज्यों के खाद्य सचिवों की केन्द्र के साथ बैठक में यह बात उभर कर आई की केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय गरीबों के पहचान के संदर्भ में गलत रवैया अपना रहा है। अभी तक कि केन्द्र की खाद्य सुरक्षा स्कीमों में गरीबी के रेखा से नीचे रहने वाले लोगों पर केिन्द्रत कार्यक्रमों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी राशन दुकानों के माध्यम से गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को अनाज उपलब्ध कराया जाता रहा है। राज्य सरकारें इस संदर्भ में राज्य और केन्द्र के बीच लगातार टकराव की स्थिति बनी रही है कि गरीबी की रेखा को कैसे परिभाषित किया जाए और गरीबों की पहचान कैसे हो?
अभी तक केन्द्र सरकार सस्ता अनाज आवंटित हेतु अंक गणितीय और आर्थिक अनुमानों का आधार लेती रही है। जबकि राज्य सरकारें केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा बीपीएल सर्वेक्षण के आधार पर चििन्हत गरीबों को सस्ता अनाज उपलब्ध करवाती है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि पिछले लगभग तीन दशकों से देश खाद्य असुरक्षा की तरफ बढ़ रहा है। खाद्यान्न उत्पादन घट रहा है, खाद्यान्न आयात बढ़ रहे हैं और खाद्य सुरक्षा समाप्त हो रही है। भारत सहित विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता घट रही है। भारत में जहां खाद्यान्नों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता वर्ष 1976-80 में 190 किलो प्रति वर्ष थी वह घटकर 2004-07 के दौरान मात्र 186 किलोग्राम प्रति वर्ष रह गई। पिछले 3 वर्षों में खाद्य पदार्थों की कीमतें दुगुनी हो गई है, जिसके चलते पहले से ही दुनिया में 85 करोड़ भुखमरी से पीड़ित लोगों की संख्या में 10 करोड़ का इजाफा हो गया है। यानी आज दुनियाभर में लगभग 96 करोड लोग भुखमरी के शिकार हैं।
केन्द्र सरकार ने एक ओर तो प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियमों की रूपरेखा तैयार कर ली है। इस संदर्भ में एन.सी. सक्सेना की अध्यक्षता में गरीबी की रेखा संबंधित मापदण्ड तैयार करने हेतु एक कमेटी का गठन भी कर दिया है। नीति-निर्धारकों से अपेक्षा है कि देश और दुनिया में बढ़ती भुखमरी के व्यापक संदर्भ में और खाद्य पदार्थों की बढती कीमतों का भी जायजा देते हुए गरीबी की रेखा को पुन: परिभाषित किया जाए।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में लगभग 96 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं, जिसमें से 22 करोड़ से अधिक लोग भारत में रहते हैं। यदि सरकार नेक-नियति से खाद्य सुरक्षा अधिनियम लाना और लागू करना चाहती है तो उसे गरीबी की रेखा की अवधारणा को बदलना होगा।
डॉ. अश्विनी महाजन
प्रकाशन तिथि: जुलाई 12, 2009
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