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सत्यम घोटाले से उभरते सवाल

द्वारा : ashwanimahajan    

लेखक : डॉ. अश्विनी महाजन
सत्यम कंप्यूटर्स कंपनी जो भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रगति का एक प्रमुख आधार स्तंभ रही है जो अभी तक भारत
की चौथी बड़ी साफ्टवेयर कंपनी रही है, 7 जनवरी 2009 को उसके संस्थापक अध्यक्ष रामलिंगा राजू  की 8000 करोड़ रूपये के घोटाले की स्वीकारोक्ति के बाद धराशायी हो गई है। रामलिंगा राजू ने माना कि  पिछले सात वर्षों से उसने सिलसिलेवार ढंग से कंपनी के खातों में हेरा फेरी की और जो नकदी और बैंक बैलेंस खातों में दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में आस्तित्व में है ही नहीं। उसकी नकदी और बैंक बैलेंस 5040 करोड़ रूपये कम है। कहा जा रहा है कि कुल घोटाला लगभग 8000 करोड़ रूपये का है। देश में निवेश पर बुरा असर टालने, अंश धारियों के हितों की रक्षा और 51 हजार कर्मचारियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए पहले तो सरकार ने सत्यम के नये निदेशक बोर्ड का गठन किया और बाद में इस कंपनी को संकट से उभारने के लिए एक बचाव पैकेज देने का भी निर्णय किया। हालांकि इस बचाव पैकेज की राशि और प्रकार के बारे में अभी निर्णय करना बाकी है, लेकिन नििश्चत तौर पर हाल ही में अमरीकी वित्तीय संकट के समय अमरीकी सरकार द्वारा जिस प्रकार से बचाव पैकेज दिये गये उसी तर्ज पर भारत सरकार द्वारा भी इस कंपनी को बचाने का प्रयास हो रहा है।
 स्वभाविक परिणाम के नाते रामलिंगा राजू द्वारा सत्य की घोषणा के बाद सत्यम कम्प्यूटर्स के शेयर बाजार में पहले ही दिन 80 प्रतिश्त लुढ़क गये। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उसके ए.डी.आर. का भाव 90 प्रतिशत कम होने के बाद उसकी खरीद-फरोख्त बंद कर दी गई। सरकार ने भी आनन फानन में सत्यम समूह की आठ कंपनिओं की जांच के आदेश दे दिये। `सेबी`, कंपनी विधि बोर्ड और इन्सटीच्यूट ऑफ चार्टड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया ने भी अपनी-अपनी जांच इस संबंध में शुरू कर दी है। यानि किसी भी अपराध के घटित होने के बाद जो कुछ होता है, वह सत्यम के घोटाले के बाद अत्यंत स्वभाविक ढ़ंग से शुरू हो चुका है। लेकिन इस घोटाले का परिणाम सामने दिखाई दे रहा है कि शेयर धारकेां (जिनमें से बड़ी संख्या में विदेशी भी हैं) का हजारों करोड़ रूपया डूब गया है, हजारों कर्मी बेकारी की कगार पर खड़े हैं, राजस्व की हानि हो रही है। यानि कुल मिलाकर राष्ट्र को भारी नुकसान होने जा रहा है।
ऑडिटरों की भूमिका
 लेकिन वास्तविक प्रश्न इससे काफी बड़ा और भिन्न है। सत्यम कम्प्यूटर्स का घोटाला अपने प्रकार का भारत का तो पहला हो सकता है, लेकिन दुनिया का पहला घोटाला नहीं है जिसमें खातों में हेराफेरी करते हुये फ्रॉड किया गया हो। कुछ ही समय पहले अमरीका की बिजली कंपनी एनरॉन ने भी ऐसा ही किया था। इस घोटाले मेें कंम्पनी के साथ ही अन्य ऑडिटरों की भूमिका संदिग्ध मानी गई थी। उस कंपनी के ऑडिटर `आर्थर अन्डरसन` का उस घोटाले के बाद वजूद ही मिट गया था। सत्यम कांड में भी इसी प्रकार से उसकी ऑडिटर कंपनी `प्राईसवाटर हाऊस कूपर` को नामित किया जा रहा है। यह बात सत्य भी प्रतीत होती है कि एक कंपनी पिछले कई वर्षों से सिलसिलेवार ढंग से अपने खातों में हजारों करोड़ रूपये का गबन अपने ऑडिटर की मिली भगत के बिना नहीं कर सकती। कहा जा रहा है कि `प्राईसवाटर हाऊस कूपर` नाम की इस ऑडिटिंग कंपनी कोई भी टिप्पणी देने से बच रही है।
 सच तो यह है कि जब कंपनी इतने बड़े स्तर पर अपने खातों में हेराफेरी को अंजाम दे रही थी, तो ऑडिटिंग कम्पनी उन खातों को सही प्रमाणित कर रही थी। सर्वविदित है कि ऑडिटरों को कंपनी के एक-एक लेन देन का सूक्ष्म निरीक्षण करते  हुये खातों के सही और नियमानुसार होने का प्रमाणपत्र देना होता है। ये प्रमाणित खाते शेयर धारकों को भी भेजे जाते हैं।
`सेबी` की भूमिका
 1992 में संसद द्वारा पारित अधिनियम के आधार पर स्थापित भारतीय प्रतिभूति नियमन बोर्ड (सेबी) भारतीय शेयर और बांड बाजार का नियामक संस्थान है। उससे यह अपेक्षा है कि कंपनी और दलालों द्वारा किसी भी प्रकार से शेयर धारकों के हित के खिलाफ कोई कार्य न हो। वास्तव में किसी भी क्षेत्र में नियामक संस्था होने से उस क्षेत्र के हित धारकों (स्टेक होल्डरों) में एक सुरक्षा का बोध आता है। `सेबी` के आस्तित्व में आने से इस प्रकार का बोध शेयर बाजार में निवेशकों को भी होना स्वभाविक ही है। लेकिन एक के बाद एक ऐसे कई मौके रहे जिनमें यह नियामक संस्था `फेल` रही। पिछले वर्षों में हजारों कंपनियां निवेशकों का लाखों करोड़ रूपया डुबाकर कर उड़नछूं हो गई और `सेबी` कुछ नहीं कर पाया।
घटना से सबक लेते हुये इस प्रकार के घोटालों की पुनरावृति को रोकने हेतु सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की तर्ज पर बड़ी निजी कंपनिओं पर सरकारी ऑडिट की अनिवार्यता रखी जाये। सर्वविदित है कि सरकारी क्षेत्र में घोटालों को रोकने में भारतीय महालेखा अधीक्षक (कैग) की एक बड़ी भूमिका रही है।
 दूसरे, `सेबी` के संविधान, कार्य पद्वति और कार्यनीति की समीक्षा करते हुये अधिनियम में व्यापक संशोधन किया जाये ताकि वह एक नियामक संस्था के रूप में अपनी जिम्मवारी ठीक प्रकार से निभा सके।
 तीसरे सरकार `प्राईसवाटर हाउस कूपर` सहित तमाम ऐसी अंतर्राष्ट्रीय अथवा भारतीय ऑडिटिंग कंपनियां,जो दुनिया में कहीं भी हेरा फेरी के आरोपों में लिप्त पाई गई हैं, की भारत में भी जांच कराये ताकि इनके कुकृत्यों से देश और अर्थव्यवस्था को बचाया जा सके।
प्रकाशन तिथि: जून 21, 2009
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