आज देश में 28 राज्य और 7 केन्द्र शासित इकाईयां हैं। लेकिन सभी राज्यों की आर्थिक स्थिति एक समान नहीं है। यदि प्रति व्यक्ति
आय के संदर्भ में विचार करें तो देश को दो भागों में बांटा जा सकता है। एक अगडे़ राज्य और दूसरे पिछडे़ राज्य। 1990-91 में पंजाब अधिकतम प्रति व्यक्ति आय के स्थान पर प्रथम स्थान पर था जबकि उड़ीसा न्यूनतम प्रति व्यक्ति आय के साथ सबसे नीचे स्थान पर था। वर्ष 2002-03 में महाराष्ट्र अधिकतम प्रति व्यक्ति आय के साथ-साथ शीर्ष पर पहुंच चुका था जबकि न्यूनतम आय के साथ सबसे निचले पायदान पर बिहार पहुंच चुका था। वर्ष 2005-06 में प्रति व्यक्ति आय के दृष्टि से हरियाणा सबसे आगे निकल गया था। केन्द्र शासित इकाईयों में चंडीगढ़ पहले स्थान पर और गोवा दूसरे स्थान पर और दिल्ली तीसरे स्थान पर है। हालांकि इन तीनों के प्रति व्यक्ति आय किसी भी राज्य के प्रति व्यक्ति आय से अधिक है।
बिमारु प्रांत
संदर्भ में विचार करें तो पंजाब, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, तमिलनाडु, केरल इत्यादि स्पष्ट रूप से अगड़े राज्य माने जाएंगे। जबकि बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान इत्यादि पिछड़े माने जाएंगे। कई बार आर्थिक विश्लेषक बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश इत्यादि प्रांतों को उनके नाम के प्रथम अक्षर जोड़ते हुए बीमारू प्रांतों की संज्ञा देते हैं। ऐसा इसलिए कहता जा रहा है कि इन प्रांतों में न केवल प्रति व्यक्ति आय कम रही है बकि साथ-ही-साथ इनकी आर्थिक संवृद्धि और विकास भी बहुत धीमा रहा। यदि विचार करें तो देखते हैं कि 1990-91 से 2000-2003 तक इन प्रांतों की आर्थिक संवृद्धि दर बहुत धीमी रही। और बिहार में तो राज्य का घेरलू उत्पादन बढ़ाने के बजाय लगातार घटता गया। हम देखते हैं कि इस कालखण्ड में देश की अधिक संवृद्धि की दर औसतन 5.4 प्रतिशत रही जबकि मध्य प्रदेश में यह 0.4 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 2.1 प्रतिशत, असम में 2.6 प्रतिशत और रास्थान में 3.5 प्रतिशत रही। कुल मिलाकर पिछड़े प्रांतों की आर्थिक संवृद्धि दर मात्र 1.7 प्रतिशत रही। इसलिए इन प्रांतों को बीमारू प्रांत कहना का औचित्य था।
लेकिन हाल ही के वर्षों में परिस्थितियां बदल चुकी है। अब इन पिछड़े प्रांतों में भी प्रगति दिखाई देने लगी है। वर्ष 2006-07 के आंकड़े इन तथाकथित बीमारू प्रांतों की बेहतर स्थिति की ओर इंगित कर रहे हैं। मध्य प्रदेश की औसत आर्थिक संवृद्धि की दर 10 प्रतिशत रही। जबकि उत्तर प्रदेश की आर्थिक संवृद्धि की दर 6.5 प्रतिशत, उड़ीसा की ..... प्रतिशत और राजस्थान की ..... प्रतिशत रही। शायद यह महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि बिहार की आर्थिक संवृद्धि का बढ़ना और बिहार में नई सरकार की गठन के बाद बिहार की आर्थिक संवृद्धि की दर ऋणात्मक से धनात्मक की नहीं हुई बल्कि देश भर के सभी प्रांतों को पछाड़ते हुए 11 प्रतिशत तक पहुंच गई।
एक बार पिछड़ने के बाद कोई भी प्रांत आर्थिक पिछड़ेपन के भंवर जाल में फंस जाता है। यह बात इस तथ्य से साबित होती है कि जहां अगड़े राज्यों को निवेश के नए-नए प्रस्ताव मिलते है। वही पिछडे राज्यों में निवेश कम से कम होता है। यही नहीं वित्तीय संस्थानों से भी उन्हें अगड़े राज्यों से कही कम सहायता मिलती है। वहां के लोगों का जीवन स्तर स्वाभाविक तौर पर नीचा होता है और जीवन स्तर में सुधार के सभी लक्षण उनमें नदारद होते हैं। देश के अधिकाधिक संसाधनों का उपयोग भी अगड़े राज्य ही करते हैं। योजना आयोग के आंकड़े बताते हैं कि पिछड़े प्रांतों में औसतन प्रति व्यक्ति बिजली का उपयोग अगड़े राज्यों से आधे से भी कम होता है। उनके यहां पिछड़े प्रांतों में सड़कों का प्रसार भी कम होता है और यही नहीं टेलिफोन की सुविधा भी कम होती है और कृषि के लिए नितांत आवश्यक सुविधाएं भी कम होती है। मानव विकास की सभी सूचकों में ये पिछड़े प्रांत अगड़े प्रांतों से कहीं पीछे रहते हैं। इनके यहां स्वाभाविक आयु कम होती है, साक्षरता दर नीचे होती है और इन प्रांतों में उंची मृत्यु दर और उंची जन्म भी पाई जाती है।
यह हर्ष का विषय है कि अल्पविकास के भंवर जाल से बाहर निकालते हुए पिछडे़ राज्यों में भी आर्थिक संवृद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर वर्षों के इस पिछड़ेपन से उत्पन्न समस्याओं जैसे निरक्षरता, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव, बेरोजगारी, गरीबी, ढांचागत कमियों इत्यादि की समस्याओं का समझदारी से निवारण करते हुए इन प्रांतों में आम आदमी के विकास की ओर अग्रसर हो।
आज संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यू.एन.डी.पी. के हिसाब से हमारा देश विश्व में 132वें पायदान पर खड़ा है। यदि देश के अगड़े राज्यों की तुलना मानव विकास की तुलना दुनिया के मध्य दर्जे के देशों से की जाए तो वे 60 से लेकर 10वें पायदान तक के प्रांतों के देशों के समतुल्य रहेंगे। लेकिन कुछ प्रांतों के अत्याधिक पिछड़ेपन के कारण देश दुनिया के 132वें पायदान पर पहुंच जाता है। इसलिए दुनिया में अपने देश का नाम उंचा करने के लिए भी यह जरूरी है कि पिछड़े प्रांतों के आर्थिक विकास, मानव विकास और ढांचागत विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जाए।